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मानव अब मानव न रहा- मोहम्मद आसिफ इकबाल 

मानव अब मानव न रहा,

ये विकराल रूप दानव का है।

जानवर ने जो छोड़ दिया

वही काम अब मानव का है।

बर्ताव ऐसा करते हैं कि देखे न सुहाय,

ये कैसा कलयुग आया है, 

ये कैसा संस्कार पाया है कि,

अपने ही अपनों के काम न आए।

स्वार्थ की अंधी दौड़ में ऐसे भुला प्यार,

धन-दौलत की भूख में किया रिश्तों का व्यापार,

भाई-भाई का दुश्मन हुआ सम्बंध का किया संहार,

दया करुणा अब कहां रही सबका किया तिरस्कार।

विधाता की सुंदर कृति कैसी हो गई,

इसांनियत की मूरत न जाने अब कहां खो गई। 

जिसके हाथों में था कभी सृजन का वरदान,

वही मानव बन बैठा है अब दानव के समान।

जाग उठ ऐ इंसान, लौट आ अपनी राह पर,

प्रेम और सद्‌भाव का फिर से तू निर्माण कर। 

दानव का तू अन्त कर जगा ले अंदर का भगवान, 

तभी सृष्टि का उद्धार होगा और तू कहलाएगा सच्चा इंसान।

रचयिता – मोहम्मद आसिफ इकबाल 

विशिष्ट शिक्षक 

राजकीय बुनियादी विद्यालय उलाव बेगूसराय बिहार।

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