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प्रथम रश्मि का आना -मनु कुमारी

प्रथम रश्मि का आना

कितना मनभावन लगता है,
प्रथम रश्मि का आना।
सुबह-सबेरे बाल-विहंगिनी,
गाती हो तुम गाना।

सोए थे जो नन्हें पौधे,
अलसाई सी दुनिया में।
मंद-मंद पवन के झोंके,
गीत सुनाएँ उपवन में।
लहराती फसलों ने गाया,
उत्सव का नया तराना।
कर्मपथ पर अडिग हिमालय,
दृढ़ निश्चय है ठाना।

शांत, अचेतन, निर्मल नदियाँ,
बहने लगीं धरा पर,
नव कलियाँ फिर मुस्काईं,
गुंजन करते मधुकर।
भूमिपुत्र के श्रम से ही,
धरती होती है उर्वर।
जीवन का सार सिखाता देखो,
झर-झर बहता झरना।

सुनहरी धूप की सुंदर आभा,
आकर बिखरी अवनि पर,
समता का संदेश सुनाते,
देखो उगते दिनकर।
स्नेह-ओस की बूँदों से,
आह्लादित सारा जीवन,
“मनु” त्यागो मोह-निद्रा अब,
भजो हरि कृपा-निधान।

स्वरचित एवं मौलिक
मनु कुमारी,विशिष्ट शिक्षिका प्राथमिक विद्यालय दीपनगर बिचारी,राघोपुर, सुपौल

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