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मेरा किसान-संजीत कुमार निगम

जब मंडराने लगे आसमान में बादल काले-काले,
कंधों पर कुदाल लिए खेतों की राह चले मतवाले।

जब बरसने लगीं बूँदें झम-झम,
बिछड़ी उखाड़ने लगे किसान हरदम।

बारिश की बूँदें मोतियों-सी चमकती हैं,
धरती की सूनी गोद में आशा बन बरसती हैं।

हर बूँद का मोल किसान ही पहचानता है,
अपने पसीने से उसका पूरा हिसाब चुकाता है।

धरती माँ की गोद में वह अपना श्रम, भाग्य के भरोसे बोता है,
किसान ही है जो सब जानकर भी भविष्य का सपना संजोता है।

बाढ़ भी आएगी, सुखाड़ भी आएगा,
प्रकृति का हर प्रकोप उसे आज़माएगा।

फिर भी अपना श्रम, समय और पूँजी खेतों में लगा आता है,
उम्मीद के भरोसे किसान अपना सर्वस्व निछावर कर जाता है।

उसी की मेहनत से लहलहाते हैं खेत-खलिहान,
महकती है हर थाली की रोटी, मुस्कुराता है अपना हिंदुस्तान।

हर घर की रोटी में बसता है उसका सम्मान,
सचमुच धरती का भगवान है मेरा किसान।

संजीत कुमार निगम
प्राथमिक विद्यालय आदिवासी टोला मधुरा फारबिसगंज अररिया बिहार

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