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मुट्ठी में रेत… मनु कुमारी



मुट्ठी में रेत-सी है यह जीवन की कहानी,
कब फिसल जाए उँगलियों से, किसे है यह निशानी।
काग़ज़-सा भीग जाए, जल में घुल जाए पल में,
बूँदों का बुलबुला-सा, टूटे क्षण भर के छल में।

छाया-सी चलती है देह, सूरज ढलते ही खो जाए,
समय की तेज़ हवा में,नाम-निशान मिट जाए।
न ठहराव, न ठिकाना है, न कल का है भरोसा,
सच का दीप जलाए रख, मत पाल माया की पिपासा।

आज है साँसों की सरगम, कल मौन की तैयारी,
क्षणभंगुर इस देह-पोत में, अनंत की है सवारी।
इसलिए हो सचेत सदा, हर पल का मोल पहचानो,
मिथ्या मोह की आँधी में, आत्मदीप को जानो।

शुभ कर्मों की राह चुनो, करुणा को आधार बनाओ,
ईश्वर-भक्ति के दीप जला, अंतर का अंधेरा हटाओ।
जो मिला है क्षण भर को, उसे अर्थमय कर जाना,
मुट्ठी में रेत लिखी सीख—जीवन को सच में पाना।

स्वरचित एवं मौलिक
मनु कुमारी , विशिष्ट शिक्षिका, प्राथमिक विद्यालय दीपनगर बिचारी, राघोपुर, सुपौल

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