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“नवदुर्गा की हुंकार” – चंद्रकांत कुमार

Chandrakant Kumar Choudhary

Chandrakant Kumar Choudhary

“नवदुर्गा की हुंकार” – चंद्रकांत कुमार

उठो तेजस्वी…!

अपने जीवन में हुंकार भरो,
नवयुग के जीवन का निर्माण करो,
माँ दुर्गा के दिव्य तेज को धरो,
जिससे परिवार-समाज का उत्थान हो।

नहीं झुकेगा सत्य कभी,
अन्याय व आघात को न सहेंगे कभी,
ज्ञान-शस्त्र से न बनेंगे हम दंभी,
अज्ञानता-अज्ञानियों जैसे न बनेंगे अंधी।

माँ हमे सद्बुद्धि दे कि–
माँ शैलपुत्री जैसा धैर्य जगे,
हमारा पर्वत-सा संकल्प रहे,
माँ ब्रह्मचारिणी जैसे तप जगे,
हमारा लक्ष्य सदा निष्कलंक रहे।

माँ हमे शक्ति दे कि–
माँ चंद्रघंटा जैसे हमे साहस जगे,
हम अन्यायों से संघर्ष करें,
माँ कूष्मांडा जैसी सृजन-ज्योति से,
अपने नवसपनों को सदा सँवारें।

माँ हमे वर दे कि–
माँ स्कंदमाता के ममता की तरह,
हर शिक्षक बालक का मान करें।
माँ कात्यायनी के शौर्य तरह,
दुष्ट विचारों का प्रतिकार करें।

हे जगत जननी…!
माँ कालरात्रि बनकर तम को हर डालें।
भय-अज्ञान मिटाकर पावन समाज का निर्माण करे।
माँ महागौरी जैसे चरित्र सँवारने की सीख दे दें।
यही हमारी निर्मल जीवन पाने की भीख है।

हे माँ नारायणी…!
जगत जननी भवतारिणी सिद्धिदात्री से भीख है,
जीवन में ज्ञान-साधना को सफल बनाने की यह गीत है,
कि हम में नौ शक्तियों के दिव्य आदर्श बने रहे,
ज्ञान संस्कार संस्कृतियों को जन-जन तक पहुँचाते रहे।

हे माँ ज्ञान दायिनी…!
कलम हमारी शक्ति बने,
पुस्तक हमारा मशाल बने,
शिक्षा अर्थ-समाज मजबूत बने,
रूढ़ि-भेद की दीवार गिरे।

हे माँ काली…!
नकल, निराशा, नशा, कुरीतियों से हम संघर्ष करें,
श्रम, विवेक, विज्ञान, सत्य से, जीवन में नवआदर्श भरें।
लड़के-लड़कियां एक-दूसरे को सम्मान करें,
सबको आत्मसम्मान, अवसर व वैभव मिले।

हे अम्बिका…!
जाति-धर्म-शंका के भेद मिटें,
प्रत्येक हृदयों में एक-दूसरे को स्थान मिले।
गुरुओं का गौरव ज्ञान बाँटने में हो,
आत्मज्ञानियों का कर्म मानवता का दीप जलाने में हो।

हे सत्यानंदस्वरूपिणी…!
विद्यार्थी का गौरव सत्कर्म धर्मनिष्ठ ज्ञानार्जन में हो,
समाज का सत्कर्म सेवा अपनाने में हो।
चहुंओर सर्व मंगल मांगल्ये का गुणगान हो,
सर्वे भवन्तु सुखिनः का व्यवहारिक पथ हो।

हे धरती माता…!
किसानों के खेतों में हरियाली रहे,
श्रमिक के श्रम का उचित सम्मान मिले,
सीमा पर वीर सैनिकों का साहस अडिग रहे,
राष्ट्र में प्रेम-सेवा-महानता का भाव रहे,
नदियाँ निर्मल वन सुरक्षित लोगो मे यह भाव जगे,
ताकि भारत माता की इस धरा का शृंगार बचे रहे,
ज्ञान, विज्ञान और संस्कार की धारा बहते रहे,
वसुधैव कुटुम्बकम का भाव लिए भारत का उद्धार होते रहे।

हे माँ सरस्वती…!
माँ, आपकी पूजा तभी सफल होगी,
जब जन-जन का कल्याण होगें,
जब निर्बलो को संबल मिलेंगे ,
पीड़ितों के हित में काम होंगे।

उठो भारत के संतानो…!
अब ज्ञान की ज्योति जलाओ,
आलस्य को त्याग नवभारत का मान बढ़ाओ,
देवी-देवताओं के इस पावन धरा के लोगों,
जागो और एक स्वर में मानवता का जयगान सुनाओ।

जय माँ भवानी, जय माँ भारती!

चंद्रकांत कुमार; विद्यालय अध्यापक (11-12), संगीत; SVN R TPC +2 मॉडल स्कूल नयाटोल, मंसूरचक, बेगूसराय।

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