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पौधे ने माँगा पानी-उमेश कुमार सिन्हा ” निर्देशक”

हवा रुक गई,

ताप बढ़ गया,

खेतों में दरार पड़ गया।

कड़ी धूप देख मन घबराया,

हरे पौधों ने आपस में बड़बड़ाया—

“किसान भाई हम सभी को मानते नहीं,

हमारे हाल देखने आते नहीं।

कब से हम धूप में जल रहे हैं,

जल-पान बिना हम मर रहे हैं।”

एक पौधा था बड़ा ही जोकर,

करता था किसान से मसखरी।

बोला—“धूप लगती है तो मसखरी करो,

मसखरी से धूप को बरी करो!”

समझाया किसान खेलता है

कृषि के साथ, युवा है,

पूँजी लगा कर हार गया है।

तू गर्मी का ताप सह,

अपने ऊपर आप सह।

देखो, गर्मी-बादल की लड़ाई,

आकाश में है हो रही चढ़ाई।

गर्मी रहेगी, तब बादल आएँगे,

अपने ओज-जोश से हवा चलाएँगे।

गर्मी ही बादल पिघलाएगी,

न गर्मी होगी, न बादल आएँगे;

तब फिर कैसे वर्षा बरसाएँगे?

जीवन में कुछ सहना सीखो,

वातावरण के अनुसार बहना सीखो।

सुख के बाद दुख आते हैं,

दुख के बाद सुख आते हैं।

यही क्रम चलता है, मेरे सखा,

दुख में धीरज धरना सीखो—

आज भले ही ताप सताए,

कल बादल पानी बरसाएँ।

मेरी सत प्रतिशत स्वरचित और मौलिक रचना :-

उमेश कुमार सिन्हा ” निर्देशक”

डिसेंट एकेडमी वाया स्कूल रघुनाथपुर

तुलसीपथ लालापुल रघुनाथपुर

अंचल – ब्रह्मपुर (श्री ब्रह्मेश्वरनाथ धाम)

जिला – बक्सर

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