पुराने गौरव की बदली तस्वीर – जितेन्द्र पासवान
क्या बखान करूँ इस धरती का, मेरे पास अब वो शब्द कहाँ।
जिस भारत की गाथा गूँजती थी, अब वो सुनाने का वक्त कहाँ !!
कहाँ गई वो स्वर्णिम छाया, कहाँ गए वो संस्कार यहाँ?
जिस मिट्टी में त्याग बसा था, अब बस दिखता व्यापार यहाँ !!
शिक्षा भी अब बिकती देखी, ज्ञान हुआ बाज़ार यहाँ!
गुरुकुल की वो पावन धारा, ढूँढ़े नहीं मिलते गुरु महान!!
कभी गुरुओं का मान था ऊँचा, आज कहाँ वो सम्मान यहाँ?
डिग्री लेकर घूम रहे सब, पर दिखते नहीं इंसान यहाँ !!
इतिहास की बातें करते हैं, पर पढ़ने का अब ध्यान कहाँ?
संस्कारों की बातें सब करते, पर दिल में उनका स्थान कहाँ !!
क्या बखान करूँ इस धरती का, मेरे पास अब वो शब्द कहाँ।
जो था कभी जग उजियारा, आज वही खुद बेनूर यहाँ !!
मेरे पास अब वो शब्द कहाँ। हाँ, मेरे पास अब वो शब्द कहाँ।
कवि: जितेन्द्र पासवान
P.n.m+2 h/s chaturbhuj piprahi (Madhubani)

