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प्यारी लीची-कार्तिक कुमार

तू है मीठी, रस से भरी, प्यारी-प्यारी लीची,

गर्मी में ठंडक पहुँचाती, सबको लगती अच्छी।

हरे पत्तों के बीच चमकती, लाल-गुलाबी दाना,

तुझे देखकर खिल उठता है, बच्चों का मुस्काना।

गुच्छों में तू लटक रही है, जैसे मोती माला,

तेरी खुशबू मन हर लेती, लगता बड़ा निराला।

ऊपर से खुरदुरी दिखती, भीतर रस की खान,

स्वाद तेरा ऐसा प्यारा, भूले नहीं इंसान।

खेतों-बागों की तू शोभा, प्रकृति का उपहार,

किसानों की मेहनत से ही, मिलता तेरा प्यार।

धूप पड़े या वर्षा आए, तू मुस्काती रहती,

हर मौसम में अपनी महिमा, दुनिया को है कहती।

विटामिन से भरपूर होकर, स्वास्थ्य का वरदान,

तन को देती शक्ति नई, मन को देती मान।

वैशाली की धरती बोले — मेरी प्यारी शान,

लीची से ही महक रहा है, अपना हिंदुस्तान।

बच्चे-बूढ़े सबको भाती, मीठा तेरा स्वाद,

तुझे देखकर याद आ जाता, बचपन का संवाद।

आओ मिलकर वृक्ष लगाएँ, रखें प्रकृति का मान,

प्यारी लीची सदा बढ़ाए, धरती की मुस्कान।

लेखक — कार्तिक कुमार

राष्ट्रीय योग प्रशिक्षक

मध्य विद्यालय कटरमाला, गोरौल, वैशाली

7004318121

kartikyog.kumar@gmail.

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