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राधा होने की शर्त- उमेश कुमार सिन्हा

कान्हा बोले—
“मेरी राधा सदा सुखी रहे,
जग चाहे जो कुछ कहे।
दुनिया की बातों की मुझको परवाह नहीं,
बस राधा के मुख पर मुस्कान रहे।”

राधा मंद-मंद मुस्काईं,
बोलीं—
“श्याम! कहना बड़ा सरल है,
पर सहना बड़ा कठिन।
यदि तुम मेरी जगह होते,
तब समझते प्रेम का धन।”

कान्हा हँसकर बोले—
“राधे! ऐसा क्या अंतर है?
कहो, मैं भी तो जानूँ।”

राधा बोलीं—
“कभी-कभी मन सोचता है—
तुम राधा होते, मैं कृष्ण बन जाती।
मैं तेरी मुस्कान बनती,
और तुम मेरी विरह-अग्नि में जल जाते।”

कृष्ण ने हँसकर पूछा—
“तो क्या तुम्हें बड़ा आनंद आता?”

राधा बोलीं—
“हाँ! मैं खिल-खिल हँसती,
और तुम मिलन की बाट निहारते।
तब जान पाते,
प्रेम में केवल मुस्कान नहीं,
विरह के आँसू भी सँवारते।”

श्याम ने हँसकर कहा—
“अच्छा राधे! आज यही सही।
तुम मेरा मोर-मुकुट पहन लो,
मैं तेरी घाघरा-चुनरी पहन लूँ अभी।”

राधा हँसते-हँसते बोलीं—
“अरे भोले कान्हा!
इतना भी नहीं जानते?
घाघरा ऐसे नहीं पहनते,
आओ… अनाड़ी आज तुम्हें राधा बनाते!”

कान्हा घूँघट ओढ़े खड़े रहे,
राधा हँसी न रुक पाई।
बोलीं—
“श्याम! रूप बदलने से कुछ नहीं होता,
मेरे जैसा हृदय कहा है ? इस नकली राधा के रूप में,
उमेश सिन्हा के लेखनी में “सु श्री राधा का त्याग “शक्तिशाली
हुए है ! श्री कृष्ण के कर्मपथ के जीवन में l
राधा बनना इतना सहज नहीं होता…”

राधा होने की शर्त

लो, बन गए न पूरी राधा?
घूँघट ताने कृष्ण चले, राधा का रूप सजाए।
राधा मुस्काकर बोलीं—
“कान्हा! यह कैसी लीला रचाई?

यह तो केवल बाहरी सूरत है,
राधा का मुखड़ा भर अपनाया है।
राधा की आत्मा कहाँ से लाओगे?
वह तो प्रेम की अग्नि में तपकर ही पाया है।

जिस दिन सचमुच राधा बन बैठोगे,
प्रेम-विरह के आँसू स्वयं झर आएँगे।
अभी तुम्हारे वक्ष में राधा का हृदय कहाँ समाया है?
उसमें तो मेरा अनन्य प्रेम ही समाया है।

मेरे हृदय में जो कृष्ण बसे हैं,
क्या वही प्रेम तुम्हारे अंतर में उतरा है?
तुम दूर रहो तो मिलन की तड़प सताती है,
और मिलो तो बिछुड़ने का भय रुलाता है।
मिलन का मधुर क्षण भी,
विरह की पीड़ा से भीग जाता है।

बताओ, यह सब कहाँ है उस नकली राधा में?
तुम तो अनादि, अनन्त, निर्मोही हो;
मोह के बंधन की व्यथा कहाँ जानते हो?

क्या कभी देखा है बहेलिए के जाल में
फँसे पंछी की व्याकुल फड़फड़ाहट?
कृष्ण-प्रेम के जाल में बँधी राधा की छटपटाहट
ठीक वैसी ही होती है।

जब उस दशा तक पहुँच जाओगे,
तभी सच्चे अर्थों में राधा कहलाओगे।

कभी-कभी मैं सोचती हूँ, कान्हा!
मेरे प्रेम का जो ऋण तुम पर है,
क्या उसे कभी चुका पाओगे?

कृष्ण ने विनम्र होकर कहा—
“राधे! तुम्हारे प्रेम का ऋण चुकाना
अत्यन्त कठिन है।”

राधा मुस्काईं—
“कठिन ही नहीं, कान्हा…
वह तो असम्भव है।”

प्रेम के उस अद्भुत क्षण में
स्वयं कृष्ण भी राधा के प्रेम के आगे नत मस्तक हो गए।

बोलो— जय राधे!
जय श्रीकृष्ण!

विदा का अंतिम वचन

मथुरा-पथ पर चलने को जब, श्याम खड़े थे मौन।
राधा का काँप उठा हृदय, भीग गए दो नयन।

धीरे से आँचल फैलाकर, राधा बोलीं—”श्याम!
जाने से पहले दे दीजै, दो वचन मेरे नाम।”

श्याम ने प्रेमिल दृष्टि उठाई—
“बोलो प्राण-प्रिये राधे,
तुम्हारी हर इच्छा मेरे लिए वंदनीय है।”

राधा बोलीं—
“पहला वचन यही दीजै—
केवल स्वप्नों में ही नहीं,
जब तक यह जीवन शेष रहे,
मेरे रोम-रोम, मेरे श्वास-श्वास में
केवल आपका ही वास रहे।”

श्याम मुस्काए—
“राधे! यह वचन तुम्हें दिया।
अब दूसरा भी कहो।”

राधा बोलीं—
“जब यह जीवन पूर्ण हो जाए,
जब यह देह धरा पर छूट जाए,
तब मेरे अंतिम क्षण में,
मुझे आपके चरणों की धूलि मिल जाए।”

श्याम ने हाथ बढ़ाकर कहा—
“राधे! यह वचन भी मेरा रहा।”

फिर श्याम कुछ क्षण मौन रहे,
और धीरे से बोले—

“राधे! अब मेरी भी एक विनती सुनो।”

राधा ने शीश झुकाकर कहा—
“आज्ञा दीजिए, नाथ!”

श्याम बोले—
“मेरे विरह में अश्रु मत बहाना।
तुम्हारी आँखों का एक भी आँसू
मेरे कर्म-पथ के आगे खड़ा हो जाएगा।
मेरा प्रत्येक कदम लौट पड़ेगा,
इसलिए अपने नयनों को दृढ़ रखना।”

राधा की पलकों पर
सागर ठहर गया।

कंपित स्वर में बोलीं—
“श्याम… यह वचन सबसे कठिन है।
पर आपके लिए
यह भी स्वीकार है।”

इतना कहकर दोनों मौन हो गए।
शब्द समाप्त हो गए,
पर प्रेम अमर हो गया।

बोलो—जय श्री राधे!
जय श्रीकृष्ण!

भावार्थ
इस कविता में राधा कृष्ण को समझाती हैं कि केवल उनका वेश धारण कर लेने से कोई राधा नहीं बन जाता। राधा बनने के लिए उनके जैसा निष्काम, समर्पित और विरह से तपकर निर्मल हुआ प्रेम चाहिए। राधा का प्रेम इतना गहरा है कि मिलन में भी बिछोह का भय रहता है। अंत में स्वयं कृष्ण स्वीकार करते हैं कि राधा के प्रेम का ऋण वे कभी नहीं चुका सकते। यही राधा-प्रेम की सर्वोच्च महिमा है।

Umesh Kumar Sinha “Director” Decent Academy Via School Raghunathpur Dist -Buxar

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