प्रेम – सरसी छंद गीत
प्रेमिल रहना चाहत सबकी, उलझन में संसार।
करते सब हैं प्रेम जगत में, सबके अलग प्रकार।।
कोई धन से नाता जोड़े, देता है जी जान।
कोई यहाँ समझ बैठा है, धन को ही भगवान।।
इसको भी हम प्रेम कहें या, चाहत का अंबार।
करते सब हैं प्रेम जगत में, सबके अलग प्रकार।।०१।।
कोई खोया रिश्तों में है, नहीं जगत से काम।
कोई रत ईश्वर में होकर, चित को समझे धाम।।
नहीं खबर दुनिया की लेना, कहे प्रेम व्यवहार।
करते सब हैं प्रेम जगत में, सबके अलग प्रकार।।०२।।
जीव जंतु तरुवर को चाहे, सबपर रहता ध्यान।
पर-हित में जो लगा दिया है, जीवन का हर ज्ञान।।
कहें प्रेम हम आखिर किसको, जो सबको स्वीकार।
करते सब हैं प्रेम जगत में, सबके अलग प्रकार।।०३।।
गीतकार:- राम किशोर पाठक
प्रधान शिक्षक
प्राथमिक विद्यालय कालीगंज उत्तर टोला, बिहटा, पटना, बिहार।
संपर्क – 9835232978

