पिंजर मन को अब तोड़ो- गीतिका
पिंजर मन को अब तोड़ो।
दुनिया से नाता जोड़ो।।
कैद हुए क्यों कोने में।
कायरता को अब छोड़ो।।
आसमान की सैर करो।
तन को अब नहीं सिकोड़ो।।
कदम बढ़ाकर तो देखो।
शूलों से मुख मत मोड़ो।।
मंजिल कदमों में होगी।
भय के गुब्बारे फोड़ो।।
प्रेम सार है जीवन का।
क्षमता भर इसे निचोड़ो।।
शत्रु राष्ट्र का मिले अगर।
झट उसकी ग्रीवा मड़ोड़ो।।
रचनाकार:- राम किशोर पाठक
प्रधान शिक्षक
सियारामपुर, पालीगंज, पटना, बिहार।
संपर्क – ९८३५२३२९७८
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