राधे-राधे- माया छंद गीत वर्णिक
२२२-२, २११-२२१-१२२
राधे-राधे, जो जन गाते रहते हैं।
गोपाला को, नित्य सखा जो कहते हैं।।
कंसारी से, कष्ट सदा जो बतलाते।
माया का वे, ग्रास नहीं हैं बन पाते।।
भूलें जो भी, आतप ढेरों सहते हैं।
राधे-राधे, जो जन गाते रहते हैं।।०१।।
कान्हा का ही, रूप लिए बालक सारे।
देखो जैसे, कृष्ण स्वयं आज पधारे।।
भावों का ही, अर्पण कान्हा गहते हैं।
राधे-राधे, जो जन गाते रहते हैं।।०२।।
कोई पीड़ा, संशय हो तो बतलाओ।
छोड़ो चिंता, श्री चरणों में रम जाओ।।
मैं को धारे, सागर में ही बहते हैं।
राधे-राधे, जो जन गाते रहते हैं।।०३।।
गीतकार:- राम किशोर पाठक
प्रधान शिक्षक
सियारामपुर, पालीगंज, पटना, बिहार।
संपर्क – ९८३५२३२९७८
0 Likes

