मुस्कान – उल्लाला छंद गीत
दशरथ नंदन मुख सखी, मंद-मंद मुस्कान है।
आओ उनसे पूछकर, दिल मेरा अनजान है।।
नैना जबसे है लड़ी, साँसे मेरी तेज है।
कोई भी लख ले जिसे, करना भी परहेज है।।
मैं तो हारी चित सखी, उनसे पूछा है नहीं।
समझ न पाऊँ क्या करूँ, राह दिखाओ तो सही।।
मोह पाश में बँध गया, दिल मेरा नादान है।
दशरथ नंदन मुख सखी, मंद-मंद मुस्कान है।।०१।।
बड़ा अनूठा प्रण सखी, कर बैठे हैं तात जी।
शंका मुझमें जन रही, कोमल-कोमल गात जी।
धनुष चाप कैसे सखी, चढ़ पाए इस ढंग से।
कोई भी तो युक्ति हो, शोभित उनके अंग से।।
गौरा से वर माँगने, करना अब प्रस्थान है।
दशरथ नंदन मुख सखी, मंद-मंद मुस्कान है।।०२।।
हँसती सखियाँ कह उठी, धनुसायक रघुवीर जी।
सहज खेल उनके लिए, होना नहीं अधीर जी।।
संग गहे आशीष जो, मुनि सेवा कर नित्य जी।
दुष्कर उसको क्या भला, जग का कोई कृत्य जी।।
सिया राम के संग में, गौरी लिखी विधान है।
दशरथ नंदन मुख सखी, मंद-मंद मुस्कान है।।०३।।
गीतकार:- राम किशोर पाठक
प्रधान शिक्षक
सियारामपुर, पालीगंज, पटना, बिहार।
संपर्क – ९८३५२३२९७८

