प्रणत पाल हे राम आइए- इंदिरा छंद वर्णिक
१११-२१२-२१२-१२
प्रणत पाल हे राम आइए।
विनित त्रस्त है ध्यान लाइए।।
प्रखर सूर्य का तेज हो गया।
सकल जीव निस्तेज हो गया।।
असर ताप का देख रो रहा।
कसर मौत का लेख हो रहा।।
अगर हो सके तो बचाइए।
प्रणत पाल हे राम आइए।।०१।।
मिलन रोहिणी संग सूर्य का।
दिवस नौतपा जंग तूर्य का।।
विहग वृंद भी लुप्त हो रहे।
विटप मंद हो सुप्त हो रहे।।
सुहृद आप हैं मान जाइए।
प्रणत पाल हे राम आइए।।०२।।
विकट हाल में भाल सी रहे।
निकट काल के गाल जी रहे।।
अवनि त्रस्त है त्राण चाहती।
ललित भाव कल्याण चाहती।।
सहज मार्ग कोई सुझाइए।
प्रणत पाल हे राम आइए।।०३।।
सुखद भाव का लोप हो गया।
दुखद दंश का कोप हो गया।।
विकल हो सभी हैं पुकारते।
दिवस रैन यूँ हैं गुजारते।।
वरद हस्त वर्षा कराइए।
प्रणत पाल हे राम आइए।।०४।।
अनल बाण है सूर्य साधते।
पवन देव भी डंक मारते।।
व्यथित जीव सारे गुहारते।
चरण आप की हैं निहारते।।
भुवन भार रक्षा उठाइए।
प्रणत पाल हे राम आइए।।०५।।
गीतकार:- राम किशोर पाठक
प्रधान शिक्षक
सियारामपुर, पालीगंज, पटना, बिहार।
संपर्क – ९८३५२३२९७८

