ग़ज़ल
दूर कितना मगर चलेंगे हम।
दिख रहा है शहर चलेंगे हम।।
शीत अब छोड़ है गया मग को।
दिख रही है डगर चलेंगे हम।।
मान्यताऍं नहीं सरल फिर भी।
भूख कहती उधर चलेंगे हम।।
लोग कहते कई हुनर मुझमें।
कायदे में कसर चलेंगे हम।।
ऑंधियों को नहीं कभी देखा।
अब दिखी है लहर चलेंगे हम।।
रेत ऊपर बहर लिखी मैंने।
मिट गया है फिगर चलेंगे हम।
नौकरी थी सभी मगन थे हम।
साथ सुखमय सफर चलेंगे हम।
नौकरी थी मगर बिना पेंशन।
व्यर्थ सूखी नहर चलेंगे हम।।
आज”अनजान”हैं लगे पीने।
हैं पिए सब जहर चलेंगे हम।।
रामपाल प्रसाद सिंह ‘अनजान’
मध्य विद्यालय दर्वेभदौर
अवकाश प्राप्त पेंशन रहीत शिक्षक
की अंतर्व्यथा
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