पर्यावरण
उठी जगत में आज क्यों,वही पुरानी बात फिर।
दिखा उजाला था कभी,अभी सजी है रात फिर।।
बढ़ता ताप जगा रहा, संकट सिर पर है खड़ा।
एक नहीं हर हाथ से, भरना है खाली घड़ा।।
देख दृश्य पर्यावरण,करते चिंतन जा रहे।
पेड़ लगाने का विषय,थल पर कब ?हर्षा रहे।।
दूर-दूर जो पेड़ हैं,गले-गले तक ला सकें।
मुश्किल इसको मानकर,संभव आज बना सकें।।
वृक्ष एक कर से लगा,पाते प्रभु् सम्मान है।
धर्म ग्रंथ कहते सभी,उत्तम यह श्रमदान है।।
अपने शिशु से श्रेष्ठ हम,इनको इज्जत दे रहे।
इस उपकारी वृक्ष से,आशीष दुआ ले रहे।।
यूँ तो सरकारी व्ययन,झरने जैसे झड़ रहे।
ढाल दिशा सम देखकर,आपस में जन लड़ रहे।।
बूँदें वर्षा की कहीं,राह मध्य दम तोड़तीं।
दृश्य विदारक देखकर,आँखें दुख से जोड़तीं।।
सागर मंथन की तरह,बन जाए अभियान यह।
आँगन में हो उर्वशी,कम है क्या सम्मान यह।
पेड़ लगाना पर्व है, जागे जग संदेश से।
स्वच्छ रहे “अनजान” हृदय,आपस काले क्लेश से।।
रामपाल प्रसाद सिंह ‘अनजान’
सेवा निवृत शिक्षक
मध्य विद्यालय दरवे-भदौर
भंडारा पटना बिहार

