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रसधार है नारी-अर्जुन प्रभात

प्रकृति की कल्पना कोमल, मधुर रस धार है नारी।

नहीं नर से कहीं कम ,सृष्टि का श्रृंगार है नारी ।।

    ये नारी स्नेह की प्रतिमा

      ये ममता का भरा गागर

   दया की है बनी देवी

      हृदय में प्रेम का सागर

क्षमा ,ममता,तपस्या,त्याग का भंडार है नारी ।

नहीं नर से कहीं कम ,सृष्टि का श्रृंगार है नारी ।।

         यही मां बन के दुलराती

        प्रिया का प्यार देती है

          बहन बन बांधती राखी

        मधुर मनुहार देती है

हृदय के साज का सुंदर सरस झंकार है नारी ।

नहीं नर से कहीं कम ,सृष्टि का श्रृंगार है नारी ।।

           इसी ने सभ्यता का पाठ

        मानव को पढ़ाया है

        पकड़ कर हाथ नित

                 सन्मार्ग पर चलना सिखाया है

कभी आदेश का स्वर है, कभी मनुहार है नारी ।

नहीं नर से कहीं कम ,सृष्टि का श्रृंगार है नारी ।।

        ये गार्गी है ,ये मैत्रेयी

         यही है भारती,सीता

          यही मीरा, यही राधा

              ये लक्ष्मी बाई सुपुनीता

यही लक्ष्मी, सरस्वती, चंडिका अवतार है नारी ।

नहीं नर से कहीं कम ,सृष्टि का श्रृंगार है नारी ।।

         ये नारी फूल सी कोमल

        धरा जैसी सहनशीला

            विविध रूपों में करती है

              धरा पर यह विविध लीला

 कभी कोमल कली है यह, कभी अंगार है नारी ।

नहीं नर से कहीं कम ,सृष्टि का श्रृंगार है नारी ।।

         इसी से है सुखी जीवन

         इसी में प्यार पलता है

             इसी का त्याग दीपक बन

            यहां दिन रात जलता है

कभी मथुरा, कभी काशी, कभी हरिद्वार है नारी ।

नहीं नर से कहीं कम ,सृष्टि का श्रृंगार है नारी ।।

     अर्जुन प्रभात 

     प्राचार्य

    डॉ 0 जे0एम 0टी 0एस 0 ए 0एन0एस0 इंटर कॉलेज, सुल्तानपुर

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