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रे ! मानव -विजय शंकर ठाकुर 

रे !मानव ,तू मानव बन ।

     तू साध,

अपने मन,वचन और कर्म,

     समझ ले,

इस जीवन का मर्म,

अधर्म मत,धर्म कर।

    तू शूल न बन,

जीवन का मूल समझ ।

     दिखा संवेदनाएं,

समस्त जीवों के प्रति,

    तू जान ले,

जीवात्मा, परमात्मा का अंश है।

    खोल स्नेह का पिटारा,

लुटा!प्रेम ,दया और करुणा ।

    बन अहिंसक,

मानव के प्रति भी ।

मन, वचन और कर्म से।

   तू,आपदा मत बन,

समाज और पर्यावरण के लिए ।

   निभा अपना फर्ज़,

उतार ले अपना कर्ज़,

वास्तव में यही सत्कर्म है,

यही मानवता का धर्म है ।

   इसलिए, रे मानव !

  तू ,मानव बन।

विजय शंकर ठाकुर 

   विशिष्ट शिक्षक 

म वि गोगलकटोल 

प्रखंड बोखड़ा 

जिला सीतामढ़ी

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