प्रकृति यौवन का रूप धार,
करती नित्य-नूतन श्रृंगार,
सौंदर्य शिखाओं में अनंत,
चहुँ ओर खिला यह दिग-दिगंत,
कण-कण में उल्लास छा गया ।
ऋतुराज बसंत है आ गया ।
पीत-वर्णी पुष्पित ओढ़ चुनर,
मँडराते पुष्पों पर भ्रमर,
सौरभ की शीतल ज्वाला है,
मन मस्त हुआ मतवाला है,
बासंती रूप है भा गया ।
ऋतुराज बसंत है आ गया ।
नई फसलें होती तैयार,
अन्नपूर्णा भरती भंडार,
पुरवाई लाई मधु-सुगंध,
आम्र-मंजर की भीनी गंध,
कोकिल मधुर तान सुना गया ।
ऋतुराज बसंत है आ गया ।
ऋतुओं के हैं राजाधिराज,
मधु-मुकुल प्रकृति बनी है आज,
सजे नित-नवल सृजन के राग,
सुधा-स्नेहिल राग-विराग,
चिर-प्रतीक्षित क्षण जो पा गया ।
ऋतुराज बसंत है आ गया ।
माँ शारदे के उन्मुक्त स्वर,
निज हस्त उठा कर देती वर,
नीर-क्षीर विवेक मन-मयूर,
हो अंतःकरण से दोष दूर,
विद्या-वारिधि में समा गया ।
ऋतुराज बसंत है आ गया ।
रत्ना प्रिया, शिक्षिका (11 – 12),हिन्दी
उच्च माध्यमिक विद्यालय माधोपुर चंडी नालंदा
