ऊँ कृष्णाय नमः
विधाता छंद।
(बहाता नीर था कोई)
कुसुम जैसा खिले यौवन,
प्रफुल्लित था प्रणय पल से।
नदी की धार सागर में,
उगा था पुष्प हिय तल से।
पगों के शोर से कंपन,
नजाकत की मधुर वेला।
मुझे मोहित करे चितवन,
विदित मधुमास का मेला।
💐(2)💐
लताएँ भी चढ़ीं ऊपर,
तभी प्रारब्ध ने रोका।
सदा व्याकुल मनोगत ही,
प्रभंजन ने मुझे टोका।
बुलाऊँ मैं इशारों में,
झलक देकर चली जाती।
गुजर जाती निकट से वह,
नहीं वह पास ही आती।
(3)
खुशी का सूर्य डूबा था,
विरह में वेदना सहता।
दुखी है आज मन मेरा,
अँधेरों से घिरा रहता।
जुदाई सह न पाया था,
अकेले में दृगें रोई।
तुम्हारा गीत सुनकर ही,
बहाता नीर था कोई।
एस.के.पूनम।
सेवानिवृत्त शिक्षक,फुलवारी शरीफ,पटना

