विधा:-विधाता छंद।
(यही है सार जीवन का)
यहाँ सीखा, रहो मिलकर,
न जीओ तुम, निराशा में।
पढ़ी सरगम, उमंगों की,
न घबराया, हताशा में।।
कभी मुड़कर,न देखा प्रिय,
जिसे मैं छोड़, आया था।
अपरिचित था,शहर मुझसे,
वहीं से प्यार, पाया था।।
(2)
न करता था, शरारत मैं,
जुड़ा रिश्ता, परायों से।
प्रकृति को प्रीत, मुझसे था,
मुझे था प्यार, छायों से।।
न सच्चा है, यहाँ कोई,
प्रणय की बात क्यों करते?
पुरातन से, जुड़े लोगों,
मिथक के भाव, पर मरते।।
(3)
न लोगों ने, दिया धोखा,
रहा मैं, खुश पनाहों में।
समय बलवान, जो ठहरा,
बहा था दुख, प्रवाहों में।।
मिली जो हार, अपनो से,
न छोड़ा साथ, चिंतन का।
सफरनामा, कसमकस का,
यही है सार, जीवन का।।
एस.के.पूनम।
सेवानिवृत्त शिक्षक,फुलवारी शरीफ, पटना।
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