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वज्रतुंड – प्राकृतिक वरदान – धर्मेंद्र कुमार ठाकुर

Dharmendra Kumar Thakur

Dharmendra Kumar Thakur

वज्रतुंड (प्राकृतिक वरदान) – धर्मेंद्र कुमार ठाकुर

नभ की अनंत गहराइयों से, जो रखता धरती पर नज़र,
कुदरत का अनुपम सेवक वह, कहलाता है गिद्ध प्रखर।
करता न कभी वह जीव-घात, न शिकारी बनकर जाता है,
मृत जीवों के शव को खाकर, वह जग का संकट मिटाता है।
फैली गंदगी और सड़ते शव, जो जग में रोग फैलाते हैं,
पल भर में साफ उन्हें कर, इसके विज्ञान जगाते हैं।
महामारी के दानव से, इस वसुधा को वह बचाता है,
पर्यावरण का सच्चा मित्र, निज अचल वफ़ा निभाता है।
थी खुशहाल ज़मीन यह अपनी, जब तक इनका पहरा था,
पर मानव की एक भूल ने, दिया ज़ख्म जो गहरा था।
दर्दनिवारक ‘डाइक्लोफेनाक’, पशुओं को जब खिलाई गई,
अंजाने में इस रक्षक की, वह मौत का कारण लाई गई।
दूषित मांस को खाते ही, गुर्दे उनके नाकाम हुए,
नभ के वे राजा पल भर में, असहाय और बेजान हुए।
कीटनाशकों का बढ़ता ज़हर, ऊंचे पेड़ों का कटना भारी,
लुप्त हो गए वे साथी सारे, रोती आज प्रकृति बेचारी।
सूनी है आज आकाश-राह, ढूँढे आँखें व्याकुल होकर,
आहत कुदरत भी रोती है, अपने इस सच्चे मित्र को खोकर।
आओ संकल्प करें मिलकर, इस सच्चे रक्षक को बचाएँ,
पर्यावरण के इस सजग मित्र का, फिर से जग में मान बढ़ाएँ।

धर्मेंद्र कुमार ठाकुर
प्राथमिक विद्यालय रेही टोला
रानीगंज अररिया

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