वो रावण था, क्योंकि वसुधा को
शापित कर अधिकार किया।
गंधर्व, यक्ष पर क्या कहना,
देवों पर अत्याचार किया।
वो रावण था, क्योंकि स्वयं को,
भगवान से ऊपर मान लिया।
ना माना वेद और शास्त्र नियम,
ऋषियों तक का भी वो प्राण लिया।
वो रावण था, क्योंकि स्व भ्राता,
कुबेर पर भी आक्रमण किया।
पुष्पक विमान और स्वर्ण लंका,
बलपूर्वक उसने छीन लिया।
वो रावण था, क्योंकि रंभा से
बलपूर्वक दुराचार किया।
इच्छा विरुद्ध, स्त्री स्पर्श से
मस्तक खंडन का श्राप मिला।
वो रावण था, क्योंकि पर नारी को,
बलपूर्वक पाना चाहता था।
भार्या समझाये या भाई, गुरु,
वो नहीं किसी की मानता था।
वो रावण था, क्योंकि सीता का
छलपूर्वक अपहरण किया।
अपने अनैतिक कार्य सिद्धि में,
साधु का वेश धारण किया।
वो रावण था, क्योंकि निज भाई,
विभीषण का भी त्याग किया।
अपने हठधर्म की आड़ में ही,
कुल नाश का भी दुर्भाग्य लिया।
वो रावण था, विद्वान बहुत ही,
धर्म, उपनिषद का ज्ञाता था।
पर नीति, न्याय, सदगुण, परहित,
यह मंत्र न उसको भाता था।
वो रावण था, क्योंकि उसके
दस सिर थे दस बुद्धि कारक।
पर दस विकार को धारण कर,
बन गया स्वयं का संहारक।
वो रावण था, इतना सब कुछ
होकर भी संधि भेजे राम।
पर दर्प बढ़ा था इतना कि,
ना आया उसके यह भी काम।
वो रावण था, तब तो भगवन ने,
उसका ऐसा संहार किया।
शोषित, पीड़ित जनता का प्रभु ने
स्वयं ही आ उद्धार किया।
वो रावण था, तब तो अब तक,
उसके कर्मों को गिनाते हो!
हर विजयादशमी के शुभ दिन,
अब तक तुम उसे जलाते हो।
पर क्या तुमने कभी सोचा स्वयं,
कब तक बस उसे दुत्कारोगे?
जो तेरे मन में है बैठा,
उस रावण को कब मारोगे?
क्या झूठा दंभ और अनीति,
नहीं स्वयं तुम्हारे अंदर है?
क्या तुम हो मन से शुद्ध पूर्ण,
और हृदय विशाल समंदर है?
क्यों आज भी बेटियों के साथ,
कहीं कोई दुराचार होता है?
क्यों फिर संपत्ति विवाद में ही,
भाई पर भी वार होता है?
क्यों काम वासना इतनी कि,
पर नारी देख दृष्टि मैली?
क्यों क्रोध, मोह, और लालच फिर,
मन के अंदर तेरे फैली?
कब मर्यादित हो राम भक्त सा,
तुम भी आचरण सुधरोगे?
जो तेरे मन में है बैठा,
उस रावण को कब मारोगे?
तो बस फिर राम का नाम न लो,
उनका सिद्धांत भी मानो तुम!
अब बहुत हुआ ये विकृत कर्म,
संकल्प शुद्धता का ठानो तुम।
तो आओ करते हैं हम प्रण,
रावण जो अबकी जलाएंगे।
मन में जो छिपा बैठा रावण,
एक तीर उसपर भी चलाएं!
धीरज कुमार
मुजफ्फरपुर, बिहार

