Site icon पद्यपंकज

मेरा इको क्लब परिवार

1000002298.jpg

जब धरती माँ की आँखें भर आईं,

सूखी नदियाँ, थकी हुई हरियाई…

तब नन्हे क़दम आगे बढ़कर बोले—

“माँ, अब हम हैं… तू मत रोना।”

 

नन्हे हाथों में पौधों की साँसें,

मासूम आँखों में कल की आसें।

सोनाक्षी की मुस्कान में हरियाली,

आरती की शपथ में धरती की लाली।

 

साक्षी ने जल को जीवन माना,

बबी ने हर कोने में सपना सजाया।

सावरी ने प्लास्टिक से रिश्ता तोड़ा,

नन्हे प्रयासों से भविष्य को जोड़ा।

 

कभी धूप में रोपा पौधों का प्यार,

कभी झाड़ू से मिटाया गंदगी का भार।

पसीने की बूँदें जब मिट्टी में गिरीं,

धरती माँ की थकी साँसें फिर से निखरीं।

 

हर निर्णय में बच्चों की ही चाही,

हर पग पर उनकी मुस्कान समाई।

थककर जब बच्चे रुक से जाते,

विवेक का स्नेह उन्हें फिर चलाते।

 

इन प्रयासों को जब मिली सराहना,

दिलों में भर गई नई प्रेरणा।

DPO सुजीत कुमार दास ने जब सराहा,

हर बच्चे ने और ऊँचा सपना चाहा।

 

यह केवल अभियान नहीं, जीवन का व्रत है,

हर बच्चे के दिल में प्रकृति का घर है।

धरती माँ जब मुस्कुराकर कहेगी—

“मेरे बच्चों, तुमने मेरी जान बचाई।”

— विवेक कुमार

भोला सिंह उच्च माध्यमिक विद्यालय, पुरुषोत्तमपुर कुढ़नी, मुज० 

0 Likes

Vivek Kumar

Spread the love
Exit mobile version