शीर्षक :- आगमन से विदाई तक
माँ दुर्गा के संग लक्ष्मी, सरस्वती भी आती हैं,
नवरात्र के पावन अवसर पर, खुशियाँ खूब लुटाती हैं।
कैसे करूँ स्वागत तेरा, हे माँ जगदम्बे रानी?
चरण पखारकर कहता हूँ—स्वागतम्, हे कल्याणी!
स्वागतम्! स्वागतम्! स्वागतम् तुम्हारा,
माँ, तुमसे ही जग में उजियारा।
सब विनती और प्रार्थनाओं की, आश तुम्हीं से लगाते हैं,
माँ के स्वागत में भक्तजन, रंग-बिरंगी चुनरी सजाते हैं।
तेरे चरणों में शीश झुकाकर, आशीष तुम्हारा पाते हैं,
तेरे दर्शन की अभिलाषा में, दूर-दूर से आते हैं।
शंख, मृदंग और घंटों की ध्वनि, गगन में गूँज उठती है,
आरती की पावन थाली, भक्ति की ज्योति सजाती है।
मधुर आरती के स्वरों से, वातावरण महक जाता है,
भक्तों के प्रेम और श्रद्धा से, माँ का मन हर्षाता है।
खुश होकर माँ आशीष लुटाती, सबके कष्ट मिटाती है,
भक्तों के सूने जीवन में, आशा के दीप जलाती है।
सबकी मंगलकामना लेकर, माँ दरबार में आती है,
शक्ति, साहस और विश्वास का, अनुपम भाव जगाती है।
माँ आती है, बहारें लाती है,
बच्चों के लिए उपहार लाती है।
माँ के मंदिर के आसपास, मेला सज जाता है,
रंग-बिरंगे खिलौनों से, हर कोना भर जाता है।
छोटे-बड़े दुकानदारों का, व्यवसाय खूब चल जाता है,
नन्हे-मुन्ने बच्चों के मन में, आनंद उमड़ आता है।
माँ की छत्रछाया में सबको, सुख का अनुभव होता है,
भक्ति, प्रेम और मेल-मिलाप से, मन का आँगन खिलता है।
फिर एक समय ऐसा आता, मन भारी हो जाता है,
माँ की विदाई का सोच-सोचकर, नैनों में जल भर आता है।
कैसे विदा करूँ माँ तुमको, प्रश्न यही रह जाता है,
नौ दिनों का प्रेम भरा बंधन, मन को बहुत रुलाता है।
आँसू आँखों में भर आते, मन में उठती पीर,
माँ के बिन सूना लगता है, अपना जग और घर-द्वार।
तभी माँ का आश्वासन मिलता—
“फिर आऊँगी अगले साल!”
यही सोचकर भक्त सँभलते, पाते मन में धीरज अपार।
आना माँ, फिर आना माँ,
खुशियों की सौगात लाना माँ।
तेरे चरणों में शीश झुकाएँ,
अपना आशीष बरसाना माँ!
स्वरचित मौलिक रचनाकार:-
उमेश कुमार सिन्हा ‘निर्देशक ‘
डिसेंट एकेडमी वाया स्कूल
बिहार सरकार द्वारा पूर्णतः स्वीकृत विद्यालय
गोस्वामी तुलसी दास पथ लालापुल रघुनाथपुर
अंचल- ब्रह्मपुर (श्री ब्रह्मेश्वरनाथ धाम)
जिला – बक्सर

