है उलझन बड़ी विकराल, समझ न पाया इसको कोई,
इस छोटे से पेट में देखो, कैसी जादूगरी है सोई।
ऐसे-ऐसे यंत्र यहाँ हैं, इसमें कितने तंत्र छिपे,
भीतर एक संसार बसा है, अद्भुत रासायनिक मंत्र छिपे।
मुख का द्वार खुलते ही पहला, दाँतों का कोल्हू चलता है,
“टायलिन” (एमाइलेज) का केमिकल मिलकर, स्टार्च को यहीं बदलता है।
ग्रास नली का लिफ्ट अनोखा, नीचे माल पहुँचाता है,
आमाशय के रूप में देखो, एक बड़ा मथनी आता है।
इस मथनी में हाइड्रोक्लोरिक (HCl) का, तीखा झरना बहता है,
कीटाणुओं को नष्ट करे, और भोजन गलकर पानी बनता है।
“पेप्सिन” और “रेनिन” के कटर, प्रोटीन और दूध को हैं तोड़ते,
अम्लीय माध्यम में घुलकर, ये पाचन से नाता जोड़ते।
“पेरिस्टालसिस” (क्रमाकुंचन) की लहरें, मांसपेशियों को मटकातीं,
आगे-पीछे, ऊपर-नीचे, भोजन की “काइम” (Chyme) बनातीं।
यकृत (लीवर) का केमिकल प्लांट, “पित्तरस” (Bile) तैयार करे,
पित्ताशय का छोटा टैंक, वसा को कण-कण में विभक्त करे।
अग्न्याशय (पैंक्रियाज) का कंप्यूटर, इंसुलिन का नाप रखे,
“ट्रिप्सिन” और “लाइपेज” भेजकर, हर भोजन पर दाब रखे।
कार्बोहाइड्रेट, प्रोटीन, वसा, सब अपने मूल रूप में आते,
ग्लूकोज, फैटी एसिड और एमीनो एसिड के नए नाम ये पाते।
फिर छोटी आंत का लंबा फिल्टर, अद्भुत खेल दिखाता है,
इसके भीतर “विली” (Villi) का मखमली सोफा बिछ जाता है।
करोड़ों सूक्ष्म उँगलियाँ जैसी, अवशोषण का काम करें,
खींच-खींच कर सारा पोषण, रक्त की नसों के नाम करें।
अरबों मित्र बैक्टीरिया की फ़ौज, यहाँ दिन-रात पहरा देती,
विटामिन-K और बी-कॉम्प्लेक्स का, सुंदर उपहार हमें देती।
“एंटरिक नर्वस सिस्टम” का, अपना ही एक छोटा दिमाग है,
बिना कहे मस्तिष्क के, रखता पाचन का पूरा हिसाब है।
बड़ी आंत का ड्रायर फिर, सारा पानी सोख रहा,
सूखे हुए उस अपशिष्ट को, रेक्टम की ओर ढकेल रहा।
रक्त बहा ले जाता ईंधन, “एसिमिलेशन” (स्वांगीकरण) का काम करे,
कोशिका-कोशिका को ऊर्जा देकर, जीवन का संचार करे।
अजब मशीनरी, गजब हैं पुर्जे, रात-दिन ये काम करें,
बिना थके, बिना रुके ही, जीवन का निर्माण करें।
सुलझ गई अब यह उलझन, जो लगती थी बड़ी विकराल,
पेट हमारा एक यंत्र है, ईश्वर का जो है कमाल!
धर्मेंद्र कुमार ठाकुर
प्राथमिक विद्यालय रेही टोला
रानीगंज अररिया

