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नन्हें परिंदे -अरविंद कुमार

Arvind Kumar Amar

नन्हें परिंदे
अरविंद कुमार, भरगामा, अररिया की कलम से

अभी मैं जिंदा हूं , लेकिन मेरा अस्तित्व खतरे में है , मुझे बचा लो वायदा रहा तुम्हारे घर-आंगन को चहचहाहट से भर दूंगी ।

कभी घरों में,बंगलों में दालान में,मचानों पर ची..ची..ची..ची..करती गौरेया की जोड़ी आपस में झगड़ती रहती मानो मादा गौरेया अपने पति गौरेया को दूसरी जगह नैन- मटक्का करते रंगे हाथ पकड़ ली हो ।

वैसे उत्तर बिहार सहित कोसी व सीमांचल के कई इलाकों में इसे बगरो और फुद्दी के नाम से भी जाना जाता है ।

बालू में नहलाते, गड्डे में पड़े पानी में नन्हीं सी चोच डालते , गर्दन मटकाकर आस-पास में निहारती , जरा सी आहट पाकर फुर्रररर.. से उड़ जाती ,पंख फड़फराते , झुंड में ची.ची.ची.ची की आवाज करती गौरेया हमे मानसिक शांति प्रदान करती थी।

दोस्त की तरह हमारे घरों में रहने वाली गौरेया, खेते में पड़े कीड़े-मकोड़े को खाकर हमारे फसलों की रक्षा भी करती थी ।

गौरेया से बचपन की ढेरों यादे जुड़ी हुई है ..जब हम छोटे थे तब टोकरी का एक छपरी बनाकर उसके नीचे कुछ दाना डाल देते थे । फिर उस छपरी को एक लकड़ी के सहारे खड़ी कर देते थे तथा लकड़ी में रस्सी बांधकर घर के किवाड़ के पीछे दुबक जाते थे । जैसे गौरेया दाना चुगने टोकरी के नीचे पहुंचती, हमलोग फट से रस्सी खींच लेते थे । फिर टोकरी में फंसी गौरेया के साथ घंटे खेलते थे । अंत में उसके पंख में लाल रंग लगाकर उसे उड़ा देते थे । हाथ में लुरगुज-लुरगुज करता ये जीव बड़ा ही प्यारा था ।

दुनियां भर में गौरेया की 2500 प्रजाति है । भारत में इसकी 8 जातियां है ।

सुन्दर सा प्यारा सा दिखने वाला बिहार की राजकीय पक्षी गौरेया अब हमलोगो से रूठ गई है । अब वो गांव,कस्बे तथा शहरों में बहुत कम ही दिखाई पड़ती है । कभी हमारे साथ अपना जीवन-यापन करने वाले दोस्त गौरेया कई कारणों से हमसे दूर हो रहे है जिसमे प्रमुख है- पक्की मकान का बनना, खेतों में कीटनाशक का प्रयोग, पेड़ की कटाई, वैश्विक तापमान, ध्वनि प्रदूषण तथा अनाज के दानों का पैंकिंग होना ।

विलुप्ति के कगार पर पहुंच चुकी इस नन्हीं सी जीव को संरक्षित करने के दिल्ली सरकार ने भी इसे राज्य पक्षी घोषित किया है ।

गौरेया हमारे साथ -साथ हमारे पर्यावरण का भी दोस्त है इसलिए इस रुठे दोस्त को मनाना आवश्यक है । …उनके छीने गये आवास की जगह हमें कृत्रिम या मिट्टी के आवास , वृक्षा रोपन तथा दाना-पानी का बंदोबस्त करना पड़ेगा..साथ ही सरकारी स्तर पर भी उनके संरक्षण के लिए विशेष ध्यान देने की जरूरत है ।

हालांकी 2010 से भारत और फ्रान्स की संस्था ने भी गौरेया संरक्षण के लिए मोर्चा संभाला है । गौरेया संरक्षण के लिए 20 मार्च को विश्व गैरेया दिवस भी मनाई जाती है ।

मगर फिर भी इस जीव की सुरक्षा के लिए हमारी भागीदारी महत्वपूर्ण है ताकी आंगन में फुदकने वाली इस नन्हें से परिंदें को बचाया जा सके ।

       अन्यथा आने वाली पीढ़ी इस दोस्त को सिर्फ इन्टरनेट पर ही ढूंढती रहेगी...।
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