विधा – कविता
उड़ीं वासंती खुशबू ।
पीत वसन ओढ़े धरा, अंबर दिखता लाल ,
टेसू सरसों खिल गए , मौसम बदले चाल ।
तन चढ़ता आनंद है, मन वासंती रूप,
खेतों में सरसों खिली, पीली लगती धूप ।
बर्फ पड़े जब लॉन में, सर्दी लगती खूब ,
तन गरमा लें धूप में, छोड़ उदासी ऊब ।
धूप उतरती जब धरा, मुस्काते हैं फूल ,
बाग – बगीचे मधुप ही, सुंदरता के मूल ।
शीत हवाएँ जब चली, बचपन आया पास,
दूर हुए शिकवे गिले, दिल में जागी आस ।
कुसुमों से खुशबू उड़ी, महक उठी है साँझ,
मधुकर को ज्यों मिल गई, मधुबन की सौगात ।
फूलों के सौन्दर्य से , मधुकर करता प्यार ,
चाहत रंगत मीत से, चलता है संसार ।
छुपता रवि जब व्योम में, चंदा ओढ़े शाल,
धरती पर कुहरा घिरे, तारे भी बदहाल ।
वासंती खिलता चमन, कानन खुशबू वास,
तितली मधुकर फूल से, मधुबन बनता खास ।
आशीष अम्बर
( विशिष्ट शिक्षक)
उत्क्रमित मध्य विद्यालय धनुषी
प्रखंड – केवटी
जिला – दरभंगा
बिहार

