उड़ी वासंती खुशबू -आशीष अम्बर

विधा – कविता

उड़ीं वासंती खुशबू ।

पीत वसन ओढ़े धरा, अंबर दिखता लाल ,
टेसू सरसों खिल गए , मौसम बदले चाल ।

तन चढ़ता आनंद है, मन वासंती रूप,
खेतों में सरसों खिली, पीली लगती धूप ।

बर्फ पड़े जब लॉन में, सर्दी लगती खूब ,
तन गरमा लें धूप में, छोड़ उदासी ऊब ।

धूप उतरती जब धरा, मुस्काते हैं फूल ,
बाग – बगीचे मधुप ही, सुंदरता के मूल ।

शीत हवाएँ जब चली, बचपन आया पास,
दूर हुए शिकवे गिले, दिल में जागी आस ।

कुसुमों से खुशबू उड़ी, महक उठी है साँझ,
मधुकर को ज्यों मिल गई, मधुबन की सौगात ।

फूलों के सौन्दर्य से , मधुकर करता प्यार ,
चाहत रंगत मीत से, चलता है संसार ।

छुपता रवि जब व्योम में, चंदा ओढ़े शाल,
धरती पर कुहरा घिरे, तारे भी बदहाल ।

वासंती खिलता चमन, कानन खुशबू वास,
तितली मधुकर फूल से, मधुबन बनता खास ।

आशीष अम्बर
( विशिष्ट शिक्षक)
उत्क्रमित मध्य विद्यालय धनुषी
प्रखंड – केवटी
जिला – दरभंगा
बिहार

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