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बचपन की बारात – उमेश कुमार सिन्हा “निर्देशक”

एक-एक रुपया जोड़-जोड़कर

गुल्लक अपनी भर लाई,

दादी के घर बड़े जतन से

मैंने एक गुड्डा बनवाई।

नानी के घर जाकर फिर मैंने

सुंदर-सी गुड़िया बनाई,

लहँगा, चुनरी, राज-दुपट्टा—

सारी पोशाक उसे पहनाई।

गुड़िया मेरी बड़ी नखरीली,

गुड्डा भी कम शहजादा नहीं,

दोनों को जब आमने-सामने रख दूँ,

फिर कोई झगड़ा साधारण नहीं!

मैं तो नानी के घर बैठी थी,

गुड़िया संग दिन-रात बिताती,

उधर दादी को फोन लगाकर

गुड्डे की खबर पूछ आती—

“दादी! दादी! सच-सच बोलो,

गुड्डे को कुछ हुआ तो नहीं?

भूखा तो नहीं पड़ा बेचारा,

उसने खाना खाया तो नहीं?”

दादी बोलीं—“बड़ी चिंता है!

तेरा गुड्डा रूठा पड़ा है,

बोला—‘मेरी दुल्हन कहाँ है?

नानी के घर क्यों जा बैठा है?’”

मैंने कहा—“नानी! सुन लो,

अब तो देर नहीं होनी चाहिए,

मेरे गुड्डे की शादी गुड़िया से

जल्दी से होनी चाहिए!”

नानी बोलीं—“अरी पगली!

शादी कोई खेल है क्या?”

मैं बोली—“मेरे लिए तो है,

गुड्डा मेरा फेल है क्या?

गुड़िया बिन वह खाना छोड़े,

गुड़िया बिन सोता नहीं,

राजा जैसी पोशाक पहनकर

दर्पण में भी हँसता नहीं!”

नानी हँसीं—“अच्छा! अच्छा!

बड़ी वकालत करती हो,

अपने गुड्डे की खातिर तुम

मुझसे भी बहस करती हो!”

बच्ची की भोली बातें सुनकर

नानी का दिल पिघल गया,

पचपन की उम्र भूलकर नानी

फिर से बचपन में ढल गया।

चूड़ी, बिंदी, हार, चुनरिया,

गुड़िया को सजाने लगीं,

बोलीं—“चलो, समधिन के घर,

वर देखने जाने लगीं!”

दादी के घर जब पहुँची नानी,

गुड्डे को देखा मुस्काकर,

बोलीं—“वाह! दूल्हा तो सुंदर है,

बैठा है इतना अकड़ाकर!”

दादी बोलीं—“देखो नानी,

दूल्हा हमारा खास है,

लेकिन तिलक-दहेज की बात न करना,

बच्चों का यह विश्वास है!”

नानी बोलीं—“दहेज-वहेज की

बात यहाँ बिल्कुल न होगी,

गुड़िया जैसी सुंदर बहू हो

तो दुनिया में क्या कमी होगी!”

दादी बोलीं—“सच कहती हो,

रिश्ता आज पक्का कर दें,

गुड्डे की बारात निकालकर

गुड़िया के घर धूम मचा दें!”

नाना आए, दादा आए,

घर में मची धूम निराली,

बच्चों ने मिलकर खूब सजाई

नन्ही-सी वह शादी वाली थाली।

किसी ने अक्षत लाकर रखे,

किसी ने फूल सजाए,

किसी ने गुड्डे को टोपी पहनाई,

किसी ने गीत सुनाए।

गुड़िया बैठी शर्माती थी,

गुड्डा बना शरमाया,

दोनों को जब पास बिठाया,

सारा परिवार मुस्काया।

नानी बोलीं—“शुभ हो रिश्ता!”

दादी बोलीं—“जय हो!”

बच्चे बोले—“गुड्डा-गुड़िया

आज से दोनों एक हो!”

नाना-दादा हँसते-हँसते

बच्चों में बच्चे बन गए,

बचपन की इस प्यारी शादी में

अपने दुख-सुख सब भूल गए।

न बैंड बजा, न घोड़ी आई,

न आया कोई घमंड,

फिर भी देखो इस शादी में

खुशियों का था कैसा छंद!

न लाखों का खर्च हुआ,

न कोई तिलक-दहेज,

बच्चों की मुस्कानों ने ही

कर दिया पूरा हर साज।

कहाँ बड़े-बड़े महल चाहिए,

कहाँ चाहिए धन-दौलत?

बच्चों की हँसी जहाँ गूँजे,

वहीं उतरती है खुशियों की दौलत।

बाल-बालिकाओं की किलकारी

घर की असली शान है,

उनके नन्हे-नन्हे सपनों में

पूरा हिंदुस्तान है।

बच्चे जब सपने बुनते हैं,

बड़े भी बच्चे हो जाते हैं,

गुड्डे-गुड़िया के ब्याह बहाने

बीते दिन लौट आते हैं।

छोटी-सी गुड़िया, छोटा गुड्डा,

छोटी-सी बारात,

पर इनकी खुशियों से सज जाती

पूरे घर की रात।

यही बचपन की दौलत है,

यही प्रेम की पहचान—

जहाँ बच्चों की हँसी सुनाई दे,

वहीं बसता है भगवान!

गुड्डा दूल्हा, गुड़िया दुल्हन,

नानी-दादी बराती,

बचपन की इस प्यारी दुनिया में

हर उम्र बने बच्ची-बाती!

स्वरचित एवं मौलिक कविता :-

रचनाकार:-

उमेश कुमार सिन्हा “निर्देशक”

डिसेंट एकेडमी वाया स्कूल

तुलसीपथ लालपुल रघुनाथपुर 

अंचल- ब्रह्मपुर (श्री ब्रह्मेश्वर नाथ धाम )

जिला – बक्सर (बिहार)

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