बेटियाँ संघर्षों की नींव पर
एक मजबूत महल बनातीं
भूत और वर्तमान को परे धकेलकर
भविष्य को सुदृढ़ करने में
स्वयं को खपाती।
वो होती हैं बथुआ सी
बिना खाद पानी के
गेहूँ के खेतों में उग जाती।
बेटियाँ दो कुलों के बीच में
बनती एक महीन सी डोर
जो दोनों कुलों को मजबूत बनातीं।
वह जुगनू सी होकर
हर अँधेरे में सामर्थ्यनुसार रोशनी फैलाती।
बेटियाँ भावनाओं को सहेजती सँवारती,
संवेदनाओं को जिंदा रखतीं
विपरीत परिस्थितियों में भी
धैर्य की डोर को थामकर
परिस्थितियों को अनुकूल बनातीं
वह प्रेम को पल्लवित पुष्पित कर
इंसानियत का धर्म निभातीं।
कभी पिता की परी बनतीं
तो कभी अन्याय के खिलाफ मुखर हो
हर गलत के विरुद्ध आवाज उठातीं
माँ की ढाल बनकर
उनके लिए पिता से भी लड़ जातीं।
बेटियाँ कभी माँ बनकर तो कभी बेटी बनकर
अपना हर फर्ज निभातीं।
रूचिका
0 Likes

