Site icon पद्यपंकज

भिक्षुक – धर्मेन्द्र कुमार ठाकुर

Dharmendra Kumar Thakur

Dharmendra Kumar Thakur

भिक्षुक – धर्मेन्द्र कुमार ठाकुर

कहते हैं लोग यहाँ अब न कोई दरिद्र रहा,

सबकी तिजोरी भर गई, कोई न अब फिक्रमंद रहा।

दावा है कि विकास की आंधी ने बदला हर मंजर,

सोने की दीवारें खड़ीं, चाँदी का है हर इक घर।

मगर हकीकत की जमीं पर जब बढ़ाता हूँ कदम,

झूठ के इन गगनचुंबी महलों का टूट जाता है भरम।

चौराहों की चमक के पीछे छिपी एक गहरी आह है,

हर मोड़ पर खड़ी बेबसी की एक लंबी कतार है।

दावों के बड़े-बड़े ढोल यहाँ पीटे जाते हैं,

पर भूखे पेट आज भी सड़कों पर सो जाते हैं।

चमकते हुए शहर के हर कोने, हर नुक्कड़, हर मोड़ पर,

मिल जाते हैं बेबस हाथ, व्यवस्था के हर जोड़ पर।

वे हाथ जो तरसते हैं बस एक सूखी रोटी को,

ढक नहीं पाते जो इस कड़कती ठंड में अपनी गोटी को।

हाकिम कहते हैं कि मुल्क से ग़रीबी मिट गई,

पर सच तो यह है कि ग़रीबों की ज़िंदगी ही सिमट गई।

कागज़ों पर तो हर शख़्स यहाँ अमीर हो गया,

पर धरातल पर देखो, इंसानियत का जनाज़ा निकल गया।

जब तक हर मोड़ पर फैले ये हाथ बंद न होंगे,

तब तक विकास के ये सारे दावे सिर्फ मज़ाक ही रहेंगे।

विज्ञापनों के होर्डिंग्स पर मुस्कान बेची जा रही,

मगर झुग्गियों में भूख से जान खींची जा रही।

मेट्रो की रफ़्तार में जो शोर हमें सुनाई देता है,

उसी के नीचे किसी का रोना दबा दिखाई देता है।

अट्टालिकाओं की छाया में जो अंधेरा पल रहा,

उस कड़वे सच से हर कोई आँखें मूँद कर चल रहा।

सोने की चिड़िया का नारा फिर से दोहराया जाता है,

पर एक निवाले के लिए बचपन यहाँ बिलखता जाता है।

तरक्की के इस उत्सव में वे पीछे छूट गए,

जिनके हक़ के सारे वादे बीच में ही टूट गए।

ये जो हर मोड़ पर फैले हाथ हमें झकझोरते हैं,

झूठे दावों के शीशमहलों को पल में तोड़ते हैं।

जब तक हर भूखे पेट को दाना नहीं मिल जाता,

जब तक हर बेबस चेहरे पर नूर नहीं खिल जाता,

तब तक यह चमक, यह रौनक, सब एक छलावा है,

दरिद्रता मिटने का यह शोर, बस एक दिखावा है।

 

धर्मेंद्र कुमार ठाकुर।

प्राथमिक विद्यालय रेही टोला। रानीगंज अररिया

0 Likes
Spread the love
Exit mobile version