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भूख की हुंकार – धर्मेंद्र कुमार ठाकुर

Dharmendra Kumar Thakur

Dharmendra Kumar Thakur

भूख की हुंकार
भूख उदर में जब आती है, रणचंडी-सा रूप दिखाती है,
धमनियों में लहू उबलता है, नस-नस में आग लगाती है!
सोचना नहीं क्या भोजन है, सम्मुख जो आए काल वही,
कायर सोचे पकवानों की, योद्धा की भूख कराल वही!
तुम शीला (पत्थर) की बात करो, मैं लोहे के चने चबा जाऊँ,
भूख लगे जो भीषण तो, मैं यम का भी काल बना आऊँ!
हूँ उद्यत हर उस संकट को, हँसकर मस्तक पर लेने को,
इतिहास बदल दूँ पल भर में, उदर की अग्नि को बुझाने को!
नभ को मुट्ठी में भींचूँ मैं, पाताल जगाने निकला हूँ,
भूख शांत करने की खातिर, ब्रह्मांड हिलाने निकला हूँ!
रणघोष हुआ है अंतस में, अब पीछे पाँव न धरूँगा,
जब तक न शांत हो क्षुधा मेरी, मैं काल से भी युद्ध करूँगा!
अंगार चबाना खेल मेरा, मैं वज्र को भी निगलूँ क्षण में,
तूफ़ान थमे मेरे आगे, जब उतरूँ मैं भोजन-रण में!
ये उदर नहीं रणक्षेत्र मेरा, जहाँ क्षुधा वीर हुंकार भरे,
मिट जाए भूख इस वीर की बस, जब तक न लक्ष्य साकार करे!

                                     धर्मेंद्र कुमार ठाकुर
                                   प्राथमिक विद्यालय रेही टोला 
                                       रानीगंज अररिया 
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