शीर्षक :- दीपों का उत्सव तभी सुहाए, जब कूड़ेदान को उपहार मिले। – उमेश कुमार सिन्हा ” “निर्देशक ”
दीपोत्सव का सच्चा संदेश, स्वच्छता का सम्मान,
खुद कूड़ा-कचरा समेटकर, धरा को दे नई मुस्कान।
दीपों का उत्सव तभी सुहाए, जब कूड़ेदान को उपहार मिले,
कदम-कदम पर झाड़ू लगाएँ, स्वच्छ धरा को नया शृंगार मिले।
दीवारों पर रंगोली सजती, दीपों से आँगन दमक उठे,
स्वच्छता और उजियारे से, खुशियों के सुमन महक उठें।
स्वर्ग उतर आता है जग में, जब दीप प्रज्वलित हो जाता है,
मानव के कंकड़मय पथ पर, सुख का फूल खिल जाता है।
फूल-फूल में भेद कहाँ है, चाहे निर्जीव हो या सप्राण,
एक दृष्टि को सुंदर लगता, एक परोपकार से पाता मान।
एक फूल मानव को भाता, एक देवों के शीश सजाता,
सेवा, प्रेम और त्याग का दीप, जीवन में उजियारा लाता।
दीप अँधेरा, अज्ञान मिटाकर, सद्भाव का संदेश सुनाए,
जीवन को उज्ज्वल पथ पर लाकर, मन में आशा-पुष्प खिलाए।
प्रकाश-पुंज की तेजस्विता से, नकारात्मकता दूर हो जाए,
दीपों से रची हुई चित्रकारी, मन में उत्साह भर जाए।
हाय! कितनी सुंदर, कितनी प्यारी, दीपों की ये छटा निराली,
जगमग-जगमग दीप जलें तो, लगती दुनिया बड़ी मतवाली।
प्रभु श्रीराम अयोध्या लौटे, दीपों ने स्वागत-गान सुनाया,
बुराई पर अच्छाई जीती, जन-जन ने हर्ष मनाया।
माता लक्ष्मी के प्राकट्य पर, दीप जलाकर स्वागत करते,
स्वच्छता, श्रम और सद्भाव से, सुख-समृद्धि के सपने भरते।
लक्ष्मी वहीं विराजें, जहाँ स्वच्छता का वास रहे,
जहाँ प्रेम, सदाचार और सेवा का सुंदर परिवेश रहे।
नरकासुर ने सोलह हजार कन्याओं को बंदी बनाया,
श्रीकृष्ण ने उसका वध करके, विजय का दीप जलाया।
दीपों की कतारें सजकर, अमावस का तम हर जातीं,
अंधकार के घोर हृदय में, आशा की किरणें भर जातीं।
दीप प्रेम, सेवा, भक्ति, सत्य के पावन प्रतीक कहलाएँ,
एक अकेला दीपक भी, घोर अँधेरे को दूर भगाएँ।
दीपों के समूह हमें यह, सुंदर संदेश सुनाते हैं,
एक-दूसरे के जीवन में, उजियारा भरते जाते हैं।
आओ, ऐसा दीप जलाएँ, मन से मन का मेल बढ़ाएँ,
प्रेम, एकता और परोपकार से, सुंदर समाज बनाएँ।
स्वच्छ धरा हो, निर्मल मन हो, हर आँगन में उजियारा हो,
दीपोत्सव का सच्चा संदेश—हर जीवन सुखमय, प्यारा हो!
उमेश कुमार सिन्हा ” निर्देशक”
डिसेंट एकेडमी वाया स्कूल रघुनाथपुर
बिहार सरकार द्वारा पूर्णतः स्वीकृत विद्यालय
तुलसी पथ लालापुल रघुनाथपुर
अंचल – ब्रह्मपुर , जिला – बक्सर

