धरा से अंबर तक – धर्मेंद्र कुमार ठाकुर
धीमी गति से शुरू हुआ था, मानव का यह काम,
बैलगाड़ी पर लदा हुआ था, सदियों का विश्राम।
चार कोस की दूरी तय करने में लग जाते थे दिन,
मौसम और पशुओं की ताकत पर निर्भर थे सब जन।
फिर पहिए में प्राण फूंके, विज्ञान की आई बाढ़,
भाप इंजन ने बदल दिया, धरती का पूरा ठाठ।
छुक-छुक करती रेल चली, और दौड़ीं फिर कारें,
दूरी छोटी होने लगी, टूटने लगीं दीवारें।
राइट ब्रदर्स ने पंख लगाकर, आसमान को चूमा,
नील गगन में उड़कर मानव, सारी दुनिया घूमा।
पंछी जैसा रूप धर लिया, छोड़ जमीं का साथ,
हवा चीरकर आगे बढ़ना, आ गया इसके हाथ।
आज समय की गति बदल गई, आया जेट का युग,
ध्वनि की गति को पीछे छोड़ा, मिटा दूरियों का दुख।
सुपरसोनिक बनकर जागा, इंसानी परवाज,
पलक झपकते छू लेता है, अंबर का हर राज।
बैलगाड़ी के पहिए से जो, शुरू हुई थी बात,
सुपरसोनिक जेट बन चमकी, मानव की सौगात!
अब तो समय भी छोटा लगता, सिमट रहा ब्रह्मांड,
मानव की इस मेधा का देखो, चारों ओर अखंड।
हाइपरलूप और बुलेट ट्रेन अब, भरती हैं हुंकार,
पलक झपकते मिल जाते हैं, नदियों के दो धार।
सोच और विज्ञान मिलेंगे, जब भी एक ही साथ,
नया सवेरा लिख देती है, यह इंसानी जात।
कल का पहिया आज बन गया, अंतरिक्ष का यान,
रुके न कदम, झुके न हौसला, यही हमारी शान।
धर्मेंद्र कुमार ठाकुर। प्राथमिक विद्यालय रेही टोला
रानीगंज अररिया

