मैं हूं शिक्षक
मैं इस धरा के ज्ञान धर्म का वाहक हूँ,
जननी के स्वाभिमान मर्म का नायक हूँ।
मैं शिक्षक संस्कार, सत्य तप का राही,
वसुधा से अज्ञान मिटाने वाला हूँ।
इस धरा के ज्ञान धर्म का वाहक हूँ,
जननी के स्वाभिमान मर्म का नायक हूँ।
नवजीवन की ज्योत जलाने वाला हूँ,
नव अंकुर को पुष्प बनाने वाला हूँ।
उसर तपती जलती अवनी को भी मैं,
अमिय सरस पय नींर पिलाने वाला हूँ।
इस धरा के ज्ञान धर्म का वाहक हूँ,
जननी के स्वाभिमान मर्म का नायक हूँ।
कर रहा संघर्ष सदा हालातों से,
जुझता हूँ नित जीवन के झंझावातों से।
नहीं कभी विचलित होता अपने पथ से,
नूतन सृजन नित करता हु निज हाथों से।
इस धरा के ज्ञान धर्म का वाहक हूँ,
जननी के स्वाभिमान मर्म का नायक हूँ।
अनथक , अविरा भी मैं हूँ अद्भुत राही,
स्नेह रश्मि से बंधा हुआ उर बालक से।
देख रहा नित सपना शिशु के आँखों से,
सपना है समर्थ व विकसित भारत के।
इस धरा के ज्ञान धर्म का वाहक हूँ,
जननी के स्वाभिमान मर्म का नायक हूँ।
डॉ स्नेहलता द्विवेदी आर्या
उत्क्रमित कन्या मध्य विद्यालय शरीफगंज कटिहार

