दुनियां रंग-बिरंगी – धर्मेंद्र कुमार ठाकुर
अजब तमाशा, गजब ये मेला, दुनियां रंग-बिरंगी है,
कहीं मखमली चादर ओढ़े, कहीं भयानक तंगी है।
लाखों चेहरे, लाख कहानियां, भांति-भांति के लोग यहाँ,
एक ही धरती की गोदी में, बसता अद्भुत श्वेत-स्याह।
कोई कुबेर का वंशज बनकर, महलों में इठलाता है,
सोने की थाली में सजकर, छप्पन भोग वो खाता है।
स्वाद-स्वाद में अमृत घुले, पर तृप्ति कहीं खो जाती है,
इतनी दौलत, फिर भी रात को, नींद न उसको आती है।
दूजी ओर उसी आँगन में, कड़वा सच सो जाता है,
फटे-पुराने बोरे पर, कोई भूखा ही सो जाता है।
सूखी रोटी की चाहत में, दिन भर जो खून बहाता है,
फुटपाथों के सन्नाटे में, वो सिसक-सिसक रह जाता है।
एक ही अंबर के नीचे ये, कैसा अचरज खेल यहाँ,
कहीं सजी है दीपमालिका, कहीं दीए में तेल कहाँ?
अमीरी की ज़ालिम मीनारें, ग़रीबी के आंसू पीती हैं,
ये दुनिया रंग-बिरंगी है, जो हंसती और रोती है।
महल खड़े जो अट्टहास कर, वो कतरन पर मुस्काते हैं,
रेशम के पर्दों के पीछे, कई दर्द छुपाए जाते हैं।
पर सूखी रोटी खाकर भी, जो चैन की बंसी बजाता है,
महलों के झूठे वैभव को, वो पल में मात दे जाता है।
दौलत की अंधी दौड़ यहाँ, हर रिश्ते को झुलसाती है,
मगर ग़रीब की छोटी कुटिया, अपनों का प्यार जगाती है।
एक तरफ़ है चांदी की चमक, दूजी तरफ़ है ख़ुद्दारी,
इस अजब तमाशे में देखो, भारी पड़ती लाचारी।
पर ठहर ऐ राही! सोच ज़रा, ये खेल कहाँ तक जाएगा?
सिकंदर भी जब यहाँ से गया, वो क्या साथ ले जाएगा?
मिट्टी से जन्मा हर काया, मिट्टी में ही मिल जाएगी,
ये दुनिया चाहे जितनी सजे, आख़िर में ढह ही जाएगी।
धर्मेंद्र कुमार ठाकुर
प्राथमिक विद्यालय रेही टोला
रानीगंज अररिया।

