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“ज़िम्मेदारियों का बोझ” – धर्मेंद्र कुमार ठाकुर।
खो जाता है अस्तित्व कहीं, अपनों की खातिर रोने में,
सिसक-सिसक कर आयु ढली, बस एक आस संजोने में।
क्षुधा दबा कर उदर की अपनी, धूप-स्वेद की राहों पर,
रो देता है मन भीतर से, जब जागता सूनी रातों में।
उत्तरदायित्व निगल जाते हैं, क्षुधा-तृष्णा और सावन को,
मसल दिया है एकांत ने, मन के कोमल से उपवन को।
थका-हारा वो विवश मानव, जब दुख छुपा कर आता है,
नयनों की वो जमी हुई नमी, मूक विलाप सुनाती है।
टूटा हुआ वो भीतर से, पर आधार बना जो खड़ा रहा,
जीवन के पतझड़ में भी, सूनी राहों पर लड़ा रहा।
मिटा चुका आत्मा अपनी, अब पीड़ा का कोई हिसाब नहीं,
सूखी-रूखी खुशियाँ ढूँढे, पर भाग्य में कोई स्वप्न नहीं।
पैरों के छालों का रोना, वो किससे जाकर कहे भला?
फटे हुए उन जूतों में, दम तोड़ रही है हर एक कला।
दिन भर तपती उस धूप में, जो रक्त बहाया जाता है,
कंधों पर उस भारी बोझ से, वो भीतर तक टूट जाता है।
इच्छा जो थी कभी उसकी, वो लीन हुई गुमनामी में,
अब तो बस हर एक साँस उसकी, बंधी हुई परतंत्रता में।
ना शिकाया कोई अधरों पर, पर भीतर एक समंदर है,
घुट-घुट कर वो जी रहा, जो अपनों का रक्षक है।
थक कर जब चूर वो होता है, और गीली आँखें मूँदता है,
कल फिर से कैसे मरना है, बस यही चिंता वो ढूँढता है।
अश्रुओं से भीगा नमन उसे, जो कर्तव्य का शोक सहता है,
खुद भूखा रहकर जो रोए, पर घर हँसता ही रहता है।
धर्मेंद्र कुमार ठाकुर।
प्राथमिक विद्यालय रेही टोला
रानीगंज अररिया

