Site icon पद्यपंकज

गुरु की हुंकार-राकेश कुमार

rakesh

गुरु ज्ञान का दीप जले,
भारत का तम दूर चले।
कक्षा फिर से मुक्त बने,
बालक में विश्वास जगे।

गुरु केवल आदेश नहीं,
वह केवल कर्मचारी नहीं।
उसके हाथों कल है देश,
उससे बढ़कर धर्म नहीं।

कागज का यह भार घटे,
कक्षा का अधिकार बढ़े।
फाइल, पोर्टल दूर रहें,
ज्ञान-दीप हर ओर जले।

नीति-भवन के नीतिज्ञो,
सुन लो भारत की पुकार।
देश चलाना खेल नहीं,
जनता का है यह अधिकार।

सत्ता पाकर मत भूलो,
ज्ञान-विवेक को साथ रखो।
समाज-विधि का मर्म पढ़ो,
जनहित को सर्वोपरि रखो।

संविधान का मान रहे,
लोकतंत्र बलवान रहे।
नीति बने प्रमाणों पर,
देशहित ही प्रधान रहे।

विशेषज्ञ की बात सुनो,
जनता का आघात सुनो।
कृषक, श्रमिक, गुरु, विज्ञान—
सबमें देखो हिंदुस्तान।

नीति वही जो खेत चले,
नीति वही जो गांव पले।
नीति वही जो जन को छूए,
नीति वही जो देश उठाए।

नारे से निर्माण नहीं,
भाषण से उत्थान नहीं।
श्रम से ही संसार बने,
सत्य से सम्मान बने।

गुरु को उसका कर्म मिले,
शिक्षा को फिर धर्म मिले।
बालक प्रश्न उठाता जाए,
भारत आगे बढ़ता जाए।

गुरु भयमुक्त, कक्षा मुक्त,
ज्ञान रहे हर बंधन-मुक्त।
प्रश्न जगे, विवेक जगे,
सोया भारत फिर से जगे।

पद तो आते-जाते हैं,
काल सभी को खाते हैं।
राष्ट्र रहे चिरकाल अटल,
यही हमारा धर्म सफल।

कागज घटे, कक्षा बढ़े,
आदेश घटे, विश्वास बढ़े।
नीति में हो राष्ट्र प्रथम,
शिक्षक को फिर मिले गरिमा।

गुरु जगे तो देश जगे,
ज्ञान जगे तो तेज जगे।
कक्षा-कक्षा दीप जले,
भारत का नवयुग फिर पले।

उठो, समय की मांग यही—
गुरु का फिर सम्मान रहे।
ज्ञान-विवेक बने आधार,
भारत फिर महान रहे।

राकेश कुमार,
विज्ञान शिक्षक,
मध्य विद्यालय, अमौना।

0 Likes
Spread the love
Exit mobile version