प्रभंजन आज चंचल है,
विदाई सर्द की करते।
अभी तो शुष्क धीरे से,
तुषारापात को हरते।
वसंती वात चलने से,
प्रकृति के द्वार खुल जाते।
भ्रमर जब गुनगुनाते हैं,
हजारों गीत वे गाते।
(2)
गई है रंग अब वसुधा,
हुई जगमग हरेपन से।
कहे ऋतुराज अपनों से,
डरो मत प्रिय सुनेपन से।
बुआई की किसानों ने,
प्रकंपित गाछ बरसों से।
गई है बढ़ लताएँ भी,
बिखरना गंध सरसों से।
(3)
चटकती कोंपलें कोमल,
जगाए प्रेम मानस में।
सुरभि अनुराग से रंगा,
सरस आनंद आपस में।
सखी यह, स्पर्श पुरवाई,
निमंत्रण नेह का पाई।
खुले कुंतल करे स्वागत,
भला क्यों आज शरमाई?
(4)
मिले पिकबंधु के नीचे,
मनोहर पल मृदुल छाया।
धरा श्रृंगार करतीं जब,
अनूठे रंग को लाया।
विटप पर है छिपी कोयल,
कुहू उसकी मधुर बोली।
रसिक खेले गुलालों से,
यही मधुमास की होली।
एस.के.पूनम
सेवानिवृत्त शिक्षक, फुलवारी शरीफ, पटना
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