कैसे समझोगे तुम
कैसे समझोगे तुम समय को,
जिसने लोगों को जीना सिखाया।
कैसे समझोगे तुम स्वजन को,
जिसने तुम्हारा मान बढ़ाया।
कैसे समझोगे तुम परिजन को,
जिसने तुम्हारा अपमान टाला।
कैसे समझोगे तुम मित्र को,
जिसने तुम्हारी राह आसान की।
कैसे समझोगे तुम शत्रु को,
जिसने तुममे आत्मविश्वास जगाया।
कैसे समझोगे तुम सुख को,
जो संघर्ष से अर्जित हुई।
कैसे समझोगे तुम दुख को,
जो सुख खोकर अर्जित हुई।
कैसे समझोगे तुम राजा को,
जो कष्टों की सीढ़ी चढ़कर बना।
कैसे समझोगे तुम रंक को,
जिसने स्वेच्छा से सर्वस्व लुटाया।
प्रस्तुति
बैकुंठ बिहारी
स्नातकोत्तर शिक्षक कम्प्यूटर विज्ञान उच्चतर माध्यमिक विद्यालय सहोड़ा गद्दी कोशकीपुर
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