कुछ तो तुम मुझसे अब कहते।
किस कारण तुम हो चुप रहते।।
मन आज विकल हो धधक रहा।
तुम दूर अगर हो झिझक रहा।।
अपनापन अब बोझिल लगता।
उर अंतर मुझको यह ठगता।।
पर क्यों सब-कुछ हो तुम सहते।
किस कारण तुम हो चुप रहते।।०१।।
अपनी बस हर चाहत तुमसे।
कहती तुम अब आहत हमसे।।
तुमको मतलब है बस निज से।
भँवरा मन चिपका सरसिज से।।
रस अंजन छलका फिर गहते।
किस कारण तुम हो चुप रहते।।०२।।
अब तो सहज क्षमा सुख वर दो।
मुझमें नव रस भी कुछ भर दो।।
अब प्रीतम कर में कर धर दो।
सुनसान हृदय गूँजित कर दो।।
हिय प्रेमिल सरिता बन बहते।
किस कारण तुम हो चुप रहते।।०३।।
गीतकार:- राम किशोर पाठक
प्रधान शिक्षक
सियारामपुर, पालीगंज, पटना, बिहार।
संपर्क- ९८३५२३२९७८
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