क्रोध का कुनबा – धर्मेंद्र कुमार ठाकुर
भीतर हमारे बैठा है, एक ऐसा परिवार,
जो सुख-चैन को डस लेता, कर देता लाचार।
इस कुनबे का मुखिया है, खुद क्रोध बड़ा बलवान,
आओ आज तुम्हें समझाएं, इसका पूरा खानदान।
इसकी एक लाडली बहने है, जिसका नाम है जिद,
बात-बात पर अड़ जाती जो, बढ़ाती अपनी हद।
क्रोध की अर्धांगिनी हिंसा, हरदम करती है विनाश,
सगे-संबंधी छूट जाते हैं, जब यह आती है पास।
बड़ा भाई अहंकार है इसका, सिर ऊंचा कर चलता है,
अपनी झूठी शान की खातिर, अपनों से ही खलता है।
पर क्रोध भी डरता है जिससे, वो उसका बाप है भय,
डर के साए में रहकर ही, क्रोध की होती है जय।
इसकी दो बेटियां भी हैं, निंदा और चुगली नाम,
इधर की बातें उधर घुमाना, यही इनका है काम।
इसका बेटा बैर है ऐसा, जो वर्षों तक पलता है,
मन में बदले की आग लिए, धीरे-धीरे जलता है।
एक नकचढ़ी बहू है घर में, नाम है उसका ईर्ष्या,
देख दूसरों की खुशहाली, जिसकी होती है दुर्गति।
क्रोध की पोती घृणा बनी है, नफरत का जो रूप,
रिश्तों की हरियाली सोखे, जैसे तीखी धूप।
क्रोध की मां है उपेक्षा, जो अपनों को ठुकराती,
और दादा इसका द्वेष है, जिससे कड़वाहट बढ़ जाती।
यह कुनबा जिस घर में रहता, वहां कभी न सुख आता,
हंसता-खेलता जीवन भी, पल भर में बिखर जाता।
इसलिए ओ मानव! तुम इस खानदान से दूरी बनाओ,
त्याग के सारे बैर और नफरत, जीवन को खुशहाल बनाओ।
धर्मेंद्र कुमार ठाकुर
प्राथमिक विद्यालय रेही टोला
रानीगंज अररिया

