“कुंदन” – धर्मेंद्र कुमार ठाकुर
यदि चमक जगत में पाना है, तो अंगारों पर चलना होगा,
बनकर कुंदन इस दुनिया में, तुमको तपना ही होगा।
तपने की क्षमता पाने को, धीरज धर टिकना सीखो तुम,
तूफानों के इन झोंकों में, चट्टान सरीखा दीखो तुम।
गिरना तो बस इक हिस्सा है, गिरकर उठना ही जीवन है,
जो हार मानकर बैठ गया, मृतप्राय हुआ उसका मन है।
हर चोट तुम्हें मजबूत करे, हर ठोकर एक सवेरा है,
उठ खड़े रहो फिर लड़ने को, आगे बस उजला घेरा है।
पर जग से पहले लड़ना है, अपने भीतर के दानव से,
जो आलस घेरे बैठा है, लड़ना है उस मानव से।
जो कल करना है आज करो, हर रोज़ स्वयं से जंग करो,
अपने बीते कल से बेहतर, अपना हर एक प्रसंग करो।
यदि जीत स्वयं पर पानी है, तो सुख-सुविधा को तजना होगा,
यह ऐश-ओ-आराम भुलाकर, अविरत श्रम में सजना होगा।
ये बांध रही जो बेड़ियाँ, उन सीमाओं को तोड़ो तुम,
पहचान नई गढ़ने के लिए, आलस से नाता छोड़ो तुम।
जब आँख खुले तो लक्ष्य दिखे, रातों में चैन न आने पाए,
वह नींद कहाँ फिर आँखों में, जब ध्येय हृदय में बस जाए।
जिस दिन भी तेरा यह जुनून, तेरी इस नींद से बड़ा होगा,
इतिहास गवाही देगा तब, तू सबसे ऊपर खड़ा होगा।
तप, त्याग, परिश्रम, संयम से, किस्मत का पन्ना बदलेगा,
तेरी मेहनत की स्याही से, तेरा नया मुकद्दर चमकेगा।
पहचान बनेगी कर्म तेरा, यह जग तुमको शीश झुकाएगा,
जब तपने का यह कठिन दौर, तेरी सफलता लाएगा।
धर्मेंद्र कुमार ठाकुर
प्राथमिक विद्यालय रेही टोला
रानीगंज अररिया

