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लक्ष्य-रत्ना प्रिया

Ratna Priya

रत्ना प्रिया

लक्ष्य न हो आँखों से ओझल, साहस हम दिखलाएँगे । 

उठते, गिरते और सँभलते, यूँ ही चलते जाएँगें । 

चरैवेति के महामंत्र से, जन-जन का उत्थान हो,

लगन, परिश्रम, आत्मिक बल से, व्यक्तित्व का निर्माण हो,

अपने बल से मिली सफलता, व्यक्ति को चमकाती है,

धैर्य, धीरज, नैसर्गिक गुण से, जीवन सहज बनाती है,

सहज, सरल, स्वाभाविक हो, सच्चे मानव बन पाएँगें ।

उठते, गिरते और सँभलते, यूँ ही चलते जाएँगें । 

चींटी चलती, कभी ना थकती, दूना बोझ उठाती है,

सिर पर भार कितना भी हो, असहज नहीं हो पाती है,

नियमितता, निरंतरता ही, सफलता तक ले जाती है,

विनम्रता का भाव भरकर, अहंकार दूर भगाती है,

रुकना नहीं लक्ष्य से पहले, दृढ़ संकल्प उठाएँगे ।

उठते, गिरते और सँभलते, यूँ ही चलते जाएँगें । 

परिश्रम की सुंदर फुलवारी यह, स्वेद स्वर्णिम मोती है,

यश, वैभव, ज्ञान, सम्पदा, परिश्रम की दासी होती है,

प्रयासरत रहनेवाले ही, मंजिल को छू पाते हैं,

जीवन की झंझावातों से, डरकर नहीं रुक जाते हैं,

संकल्प के धनी मनुज को, विकल्प डिगा न पाएँगें ।

उठते, गिरते और सँभलते, यूँ ही चलते जाएँगें ।

रत्ना प्रिया

शिक्षिका (11 – 12 हिन्दी )

उच्च माध्यमिक विद्यालय माधोपुर

चंडी ,नालंदा

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