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माँ-रामपाल प्रसाद सिंह ‘अनजान’ 

RAMPAL SINGH ANJAN

RAMPAL SINGH ANJAN

जन्म देकर कह रही माँ,पूज लो भगवान को।

लग गया आघात पल में,आज तो “अनजान”को।।

कर लिया ऐसा अगर मैं,छोड़कर पल्लू जरा।

फिर कहूँगा मैं पलट कर,दिल नहीं मेरा भरा।।

ग्रंथ जग के कह रहे जब,स्वर्ग तुमसे मौन है।

सृष्टि माँ तुझमें समाई,जग विधाता कौन है।।

सृष्टि को जिसने बनाई,तर गए अवतार से।

गोद दो-दो भर दिए थे,एक ही उपहार से।।

जब तलक जिंदा प्रकट हो,माँ हमारे पास में।

मर गई तो गौर करता,चल रही हर साँस में।।

सिंधु भी गहरा नहीं है,माँ तुम्हारे सामने।

मैं कहीं भी लड़खड़ाया,तू चली तब थामने।।

तुम खिलाने भोज्य रुचिकर,ला रही हो प्रेम से।

जो बचा था अन्न रूखा,खा रही हो प्रेम से।।

पुत्र माँ का त्याग करते,संकटों से भागते।

पर तुम्हारा त्याग लखकर,देव आँसू ढारते।।

प्राण भी देकर कहाँ से,ऋण बराबर कर सकूँ।

मैं अभागा क्या करूँ माँ,फल कहाँ मीठा चखूँ।।

गूँजता आँगन रहे जब,शब्द बेटा बोल से।

है नहीं वह स्वर्ग सुंदर,शब्द माँ अनमोल से।।

भाग्यशाली वे जगत में,बोल सुनते रे!अरे।

नाम से भार्या बुलाती,माँ मगर सोना खरे।।

जब तलक तुम साँस भरती,मन नहीं मंदिर लगा।

संत स्वागत मिल गया शुभ,मन नहीं चंचल जगा।।

रामपाल प्रसाद सिंह ‘अनजान’ 

सेवानिवृत शिक्षक 

मध्य विद्यालय दरवेभदौर 

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