नंद घर कान्हा आए – रेणु रंजन
भादों की वह रात
सामान्य नहीं थी।
घनघोर घटाएँ घिर आई थीं,
पर उनके गर्जन के बीच
गूँज रही थी एक दिव्य आहट,
जो हर दिशा से टकराकर
मानवता को जगा रही थी।
कारागार की दीवारें
उस रात भय से नहीं काँपीं,
बल्कि विस्मय से थर्रा उठीं—
जब देवकी की गोद में
स्वयं परमात्मा ने
बालरूप में जन्म लिया।
उसके मुख पर
चंद्रमा-सी आभा थी,
जिसे घना अंधकार
छू भी न सका।
उसकी दिव्य मुस्कान में
जैसे युगों की आशा
झिलमिला रही थी।
वासुदेव—
एक पिता के रूप में
उस रात केवल मनुष्य नहीं रहे,
वे धैर्य और विश्वास की
जीती-जागती प्रतिमा बन गए।
माथे पर संकट,
हृदय में विश्वास,
और बाँहों में
स्वयं जगत के पालनहार को लेकर
वे चल पड़े—
मुक्ति की ओर।
यमुना भी
उस रात साधारण नदी नहीं थी।
वह स्वयं भक्त बन गई थी,
कृष्ण के चरण-स्पर्श की अभिलाषा में
उफनती हुई
उनके मार्ग तक चली आई।
वासुदेव आगे बढ़े,
कान्हा ने अपना चरण
यमुना की ओर बढ़ाया—
और जैसे ही
उस पावन जल ने
उनके चरणों को स्पर्श किया,
यमुना शांत हो गई;
मानो उसे
अपनी साधना का फल मिल गया हो।
उधर गोकुल की गलियाँ
अब भी निद्रा में थीं,
पर प्रकृति के कण-कण में
कुछ बदल रहा था।
हवा में एक नई सुगंध थी,
आकाश में एक नई आभा,
और दिशाओं में
एक अनसुनी मधुर ध्वनि
धीरे-धीरे उतर रही थी।
वासुदेव पहुँचे
नंद-भवन के द्वार।
यशोदा प्रसूति के बाद
गहरी निद्रा में थीं।
उनके पास एक बालिका
शांत और निर्विकार सो रही थी।
वासुदेव ने
उस बालिका को उठाया
और नंदलाल को
यशोदा की शय्या पर सुला दिया—
उस माँ की गोद में,
जिसने अभी उसे जाना भी न था,
पर जिसके हृदय ने
उसे जन्मों से अपना मान रखा था।
प्रभात की पहली किरण के साथ
गोकुल की छतों से
स्वर उतरने लगे—
“नंद के घर लला आए!”
ढोलक की थाप गूँज उठी,
मंजीरे छनकने लगे,
और आनंद से झूम उठे
गोकुल के नर-नारी।
किसी ने कहा—
“गोपाल आए हैं!”
किसी ने पुकारा—
“नंदलाला आए हैं!”
तो किसी की आँखों में
बस एक ही नाम था—
कान्हा!
यशोदा अभी कहाँ जानती थीं
कि उनकी गोद में खेल रहा यह बालक
साक्षात् परमात्मा की लीला है।
उनके लिए तो वह
बस उनका लाल था—
उनके प्राणों का आधार,
उनके वात्सल्य का संसार।
वे उसे उठाकर
हृदय से लगा लेती हैं,
दूध पिलाती हैं,
और कान्हा भी
उस मातृ-स्नेह में ऐसे डूब जाते हैं,
मानो अनंत ब्रह्मांड के स्वामी ने
क्षणभर को
अपना देवत्व भुलाकर
माँ की गोद को ही
अपना संपूर्ण संसार मान लिया हो।
उस दिन से
गोकुल केवल गोकुल नहीं रहा—
वह प्रेम का तीर्थ बन गया।
हर द्वार पर मंगल-दीप जले,
हर आँगन में उत्सव सजा,
हर आँख में आनंद छलका,
और हर हृदय में
कृष्ण बस गए।
कान्हा केवल
नंद के घर नहीं आए थे,
वे अपने साथ
प्रेम की बाँसुरी,
करुणा का संदेश
और धर्म की नई आशा लाए थे।
उनके आगमन के साथ
मानो एक नए युग ने
आँखें खोल दी थीं—
अधर्म के अंधकार में
धर्म का दीप जला था,
और मानवता के आँगन में
प्रेम ने जन्म लिया था।
कान्हा आए, तम हरने,
प्रेम-सुधा से मन भरने।
धर्म-पथ फिर जगमगाए,
नवयुग की आहट लाए—
नंद घर कान्हा आए।
रेणु रंजन
रा प्रा वि नरगी जगदीश यज्ञशाला, सरैया, मुजफ्फरपुर, बिहार

