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पद्यपंकज के सुर-रचयिता – धर्मेंद्र कुमार ठाकुर

Dharmendra Kumar Thakur

Dharmendra Kumar Thakur

पद्यपंकज के सुर-रचयिता – धर्मेंद्र कुमार ठाकुर

साहित्य के पावन पद्यपंकज पर, सजती सुरों की माला है,
ज्ञान और अनुराग का यह, बहता अविरल मधुशाला है।
आस्था के संग मुदित भाव से, हम सब आगे बढ़ते हैं,
अमितेश की पावन वाणी से, नित नए सृजन हम गढ़ते हैं।
कनिष्का के सुर में सजती है, कविता की सुंदर हर क्यारी,
शिवेंद्र से बढ़ता मान यहाँ, चमके आभा सबसे न्यारी।
अनुपमा की जब दृष्टि मिली, शब्दों में एक उड़ान आई,
डॉक्टर चंदन श्रीवास्तव की, शीतल छाया मन को भाई।
मार्गदर्शक बनकर शिव कुमार, हर राह सुगम कर देते हैं,
राम किशोर पाठक जी भी, आशीषों से झोली भर देते हैं।
चंद्रकांत की उज्ज्वल आभा ने, हर पन्ने को चमकाया है,
अंबर और स्वराक्षी ने मिलकर, सुर का महल सजाया है।
इन सब मोतियों से मिलकर, यह पद्यपंकज मुसकाया है,
साहित्य जगत में शिक्षकों ने, अपना एक परचम लहराया है।

धर्मेंद्र कुमार ठाकुर। प्राथमिक विद्यालय रेही टोला
रानीगंज अररिया

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