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पिघल गया अनुशासन – धर्मेंद्र कुमार ठाकुर

Dharmendra Kumar Thakur

Dharmendra Kumar Thakur

पिघल गया अनुशासन – धर्मेंद्र कुमार ठाकुर

वक्त की धूप में देखो, कैसे विचार बदल जाते हैं,
जो कल तक सिर्फ ‘पिता’ थे, आज ‘दादा’ बन मुस्कुराते हैं।
नियमों के सख्त सांचे में, ढली जिनकी हर एक सांस थी,
उनके सामने ठहरने की, भला किसकी बिसात थी?
एक कड़क आवाज़ से जिनकी, यह सारा घर थम जाता था,
उस अनुशासन के साए में, बचपन सहम-सा जाता था।
जहमत न उठाई कभी किसी ने, सामने खड़े होने की भी,
पिता का वो एक सम्मान था, और कुछ वैसी बंदिशें भी।
पर वक़्त ने ली ऐसी करवट, घर में एक नया नूर आया,
कड़क मिज़ाज उस पिता के भीतर, ममत्व का समंदर गहराया।
पोते-नाती की नन्हीं किलकारी ने, बरसों की वो बर्फ पिघला दी,
जो कभी किसी से न हारे थे, उन्हें एक अबोध ने शिकस्त दिला दी।
वही पिता जो कभी, आत्मसम्मान की ऊंची मीनार थे,
आज बच्चों के नन्हें पैरों तले, झुकने को भी तैयार हैं।
सिर पर चढ़कर तांडव करते, वो मासूम हाथ जब बालों को खींचते हैं,
तब सब नियम भुलाकर वो बूढ़े दादा, भीगी आँखों से सुख को सींचते हैं।
जो हाथ कभी डांटने को उठते थे, वो अब दुलार से सहलाते हैं,
शायद पोते की सूरत में वो, अपना ही बीता बचपन पाते हैं।
सख्ती का वो मुखौटा हटा, अब सिर्फ वात्सल्य का झरना बहता है,
जो पिता कभी कह न सका दिल की, वो अब पोते से सब कहता है।

धर्मेंद्र कुमार ठाकुर
प्राथमिक विद्यालय रेही टोला
रानीगंज अररिया

 

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