राम के चरणों में केवट का प्यार – उमेश कुमार सिन्हा
गंगा तट पर राम खड़े थे, वन जाने की बेला थी,
संग सिया और लखन खड़े थे, आँखों में करुणा अलबेली थी।
नाव लिए केवट आया, मन में प्रेम अपार लिए,
देख प्रभु का रूप सलोना, श्रद्धा के उपहार लिए।
बोला केवट, सुनिए रघुवर, विनती मेरी मानिए,
पहले अपने चरण पखारूँ, फिर गंगा पार जाइए।
चरणों की रज का महिमा सुना, पत्थर नारी बन जाती है,
मेरी नाव अगर बदल गई तो, रोजी-रोटी खो जाती है।
मुस्काए प्रभु दीनदयाला, प्रेम की विनती मान गए,
केवट के निर्मल प्रेम को, अपने हृदय में स्थान दिए।
गंगाजल से चरण पखारे, आँखों में थे प्रेम के नीर,
धन्य हुआ वह भाग्यवान, पाकर प्रभु के चरणों की पीर।
नाव चली गंगा की धारा, केवट खेता प्रेम से,
राम-सिया-लखन को देखा, भर गया मन नेह से।
पार उतरकर राम ने चाहा, उतराई दे दूँ भाई,
हाथ जोड़कर केवट बोला, सुनिए प्रभु मेरे रघुराई।
आज पार मैंने उतारा, कल भवसागर तारिए,
नाविक हूँ मैं, नाविक है आप, अपना वचन निभाइए।
धन-दौलत की चाह नहीं है, बस इतना उपकार रहे,
जब तक साँस चले तन में, राम नाम आधार रहे।
जिसको पाने ऋषि तरसते, उसको प्रेम से पा लिया,
केवट ने अपनी भक्ति से, राम को अपना बना लिया।
जाति नहीं, धन-दौलत नहीं, निर्मल मन पहचान है,
राम के हृदय में भक्त का प्रेम ही सबसे महान है।
स्वरचित रचनाकार:-
उमेश कुमार सिन्हा निर्देशक
डिसेंट एकेडमी वाया स्कूल रघुनाथपुर
गोस्वामी तुलसीदास पथ लालापुल रघुनाथपुर
अंचल – ब्रह्मपुर
जिला – बक्सर

